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Revolutionary Sushila Didi | भगत सिंह की 'दीदी' क्रांतिकारी सुशीला दीदी

 




भारत के #स्वतंत्रता संग्राम के #क्रांतिकारी वीरों के बलिदान से हम ज़्यादातर भारतीय परिचित हैं। शहीद- ए- आजम #भगत_सिंह की कुर्बानी की गाथाएं हर गली-मोहल्ले में सुनाई जाती हैं। लेकिन उनका साथ देने वाली महिला क्रांतिकारियों के बारे में लोगों को बहुत ही कम जानकारी है। आज हम आपको उनकी टोली की एक और महिला क्रांतिकारी, सुशीला मोहन यानी कि भगत सिंह की #सुशीला_दीदी #Sushila_Didiके बारे में बता रहे हैं।

🇮🇳 5 मार्च 1905 को पंजाब के #दत्तोचूहड़ (अब पाकिस्तान) में जन्मीं दीदी की शिक्षा जालंधर के आर्य कन्या महाविद्यालय में हुई। उनके पिता अंग्रेजी सेना में नौकरी करते थे। पढ़ाई के दौरान सुशीला क्रांतिकारी दलों से जुड़े छात्र-छात्राओं के संपर्क में आईं। उनका मन भी #देशभक्ति में रमने लगा और देखते ही देखते, वह खुद क्रांति का हिस्सा बन गईं। 

🇮🇳 लोगों को जुलूस के लिए इकट्ठा करना, गुप्त सूचनाएं पहुँचाना और क्रांति के लिए चंदा इकट्ठा करना उनका काम हुआ करता था। यहाँ पर उनका मिलना-जुलना भगत सिंह और उनके साथियों से भी हुआ। यहाँ पर उनकी मुलाक़ात #भगवती_चरण और उनकी पत्नी #दुर्गा_देवी_वोहरा से हुई।

🇮🇳 यह सुशीला दीदी ही थीं जिन्होंने दुर्गा देवी को #दुर्गा_भाभी बना दिया। उन्होंने ही सबसे पहले यह संबोधन उन्हें दिया और फिर हर कोई क्रांतिकारी उन्हें सम्मान से दुर्गा भाभी कहने लगा और सुशीला को सुशीला दीदी।

🇮🇳 कहते हैं कि भगत सिंह भी सुशीला दीदी को बड़ी बहन की तरह सम्मान करते थे। ब्रिटिश सरकार की बहुत सी योजनाओं के खिलाफ सुशीला दीदी ने उनकी मदद की थी।

🇮🇳 #काकोरी_क्रांति #Kakori_Krantiमें जब #राम_प्रसाद_बिस्मिल और उनके साथी पकड़े गए तो उन पर मुकदमा चला। मुकदमे की पैरवी को आगे बढ़ाने के लिए धन की ज़रूरत थी। ऐसे में, सुशीला दीदी ने दस तोला #सोना दिया। बताया जाता है कि यह सोना उनकी माँ ने उनकी शादी के लिए रखा था। पर इस वीरांगना ने इसे अपने देश की आज़ादी के लिए दे दिया क्योंकि उन्हें किसी भी दौलत से ज्यादा आज़ादी से प्यार था। लेकिन यह देश की बदकिस्मती थी कि काकोरी ट्रेन को लूटकर अंग्रेजों की नींद उड़ाने वाले क्रांतिकारियों में से 4 को फाँसी की सजा सुना दी गई।

🇮🇳 इस खबर ने सुशीला दीदी और उनके जैसे बहुत से स्वतंत्रता सेनानियों को झकझोर दिया था। पर उनके कदम नहीं डगमगाए बल्कि सुशीला दीदी तो अपने घरवालों के खिलाफ चली गईं। उनके पिता ने जब उन्हें राजनीति और क्रांति से दूर रहने के लिए समझाया तो उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि घर छूटे तो छूटे लेकिन उनके #कदम देश को आज़ादी दिलाये बिना नहीं रुकेंगे।

🇮🇳 पढ़ाई पूरी करने के बाद, सुशीला दीदी कोलकाता में शिक्षिका की नौकरी करने लगीं। यहाँ पर रहते हुए भी वह लगातार क्रांतिकारियों की मदद कर रही थीं। साल था 1928, जब साइमन कमीशन का विरोध करते समय #लाला_लाजपतराय पर लाठियाँ बरसाने वाले ब्रिटिश पुलिस अफसर सांडर्स को मारने के बाद भगतसिंह, दुर्गा भाभी के साथ छद्म वेश में कलकत्ता पहुँचे।

🇮🇳 उस समय भगवती चरण भी कलकत्ता में ही थे। लखनऊ स्टेशन से ही भगत सिंह ने भगवती और सुशीला दीदी को पत्र लिख दिया था। कलकत्ता स्टेशन पर सुशीला दीदी और भगवती उन्हें लेने के लिए पहुंचे।

🇮🇳 कलकत्ता में सुशीला दीदी ने भगत सिंह को वहीं ठहराया, जहाँ वह खुद रह रहीं थी ताकि ब्रिटिश सरकार को पता न चल सके। सुशीला दीदी की मदद से भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारी ने अपनी अगली योजना पर काम किया।

🇮🇳 8 अप्रैल 1929 को #भगतसिंह और #बटुकेश्वर_दत्त को केन्द्रीय असेम्बली में बम विस्फोट करने के लिए भेजना तय किया गया और उस समय #सुशीला_दीदी, #दुर्गा_भाभी और भगवती चरण के साथ लाहौर में ही थीं। अपने मिशन पर निकलने से पहले भगत सिंह उनसे मिलने भी आए थे।

🇮🇳 लेकिन जैसा कि हम सब जानते हैं कि इस हमले में भगत सिंह की गिरफ्तारी हो गई। भगतसिंह और उनके साथियों पर जब ‘लाहौर षड्यन्त्र केस’ चला तो दीदी भगतसिंह के बचाव के लिए चंदा जमा करने कलकत्ता पहुँचीं। भवानीपुर में सभा का आयोजन हुआ और जनता से ‘भगतसिंह डिफेन्स फंड’ के लिए धन देने की अपील की गई। कलकत्ता में दीदी ने अपने इस अभियान के लिए अपनी महिला टोली के साथ एक नाटक का मंचन करके भी 12 हजार रूपए जमा किए थे। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और पूरा समय क्रांतिकारी दल को देने लगीं।

🇮🇳 अन्य क्रांतिकारियों के साथ-साथ सुशीला भी अंग्रेजों की नज़र में आने लगीं थीं। उनके खिलाफ गिरफ्तारी का आदेश जारी हो चुका था। लेकिन इसकी परवाह किए बिना भी उन्होंने #जतिंद्र_नाथ की मृत्यु के बाद, दुर्गा भाभी के साथ मिलकर भारी जुलूस निकाला। जन-जन के दिल में क्रांति की आग को भड़काया। उन्हें साल 1932 में गिरफ्तार भी किया गया। छह महीने की सजा के बाद उन्हें छोड़ा गया और उन्हें अपने घर पंजाब लौटने की हिदायत मिली।

🇮🇳 साल 1933 में उन्होंने अपने एक सहयोगी वकील #श्याम_मोहन से विवाह किया, जो खुद स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े हुए थे। साल 1942 के आंदोलन में दोनों पति-पत्नी जेल भी गए। श्याम मोहन को दिल्ली में रखा गया और दीदी को लाहौर में। इतनी यातनाएं सहने के बाद भी उनके मन से देश को आज़ाद कराने का जज्बा बिल्कुल भी कम नहीं हुआ। आखिरकार, महान वीर-वीरांगनाओं की मेहनत रंग लायी और साल 1947 में देश को आज़ादी मिली।

🇮🇳 आज़ादी के बाद की ज़िंदगी, सुशीला दीदी ने दिल्ली में #गुमनामी में ही गुजारी। उन्होंने कभी भी अपने बलिदानों के बदले सरकार से किसी भी तरह की मदद या इनाम की अपेक्षा नहीं रखी। 

🇮🇳 3 जनवरी 1963 को भारत की इस बेटी ने दुनिया को अलविदा कहा। दिल्ली के चाँदनी चौक में एक सड़क का नाम ’सुशीला मोहन मार्ग’ रखा गया था, पर शायद ही कोई इस नाम के पीछे की कहानी से परिचित हो।

🇮🇳 अक्सर यही होता आया है… हमारा इतिहास महिलाओं के बलिदान और उनकी बहादुरी को अक्सर भूल जाता है। बहुत सी ऐसी नायिकाएं हमेशा छिपी ही रह जाती हैं। सुशीला मोहन भी उन्हीं नायिकाओं में से एक हैं!

🇮🇳 देश की आज़ादी के लिए मर-मिटने वाली ऐसी वीरांगनाओं को कोटि कोटि प्रणाम!

~ निशा डागर 

साभार: thebetterindia.com

🇮🇳 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना जीवन समर्पित करने वाली; त्याग, साहस और देशप्रेम की प्रतिमूर्ति अमर #वीरांगना #सुशीला_मोहन जी को उनकी जयंती पर कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि !

🇮🇳💐🙏

🇮🇳 जय मातृभूमि 🇮🇳

#आजादी_का_अमृतकाल

साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

#Revolutionary  #Sushila_Didi #05March

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