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19 नवंबर 2025

रानी लक्ष्मीबाई – वीरता, स्वतंत्रता और अदम्य साहस की प्रतीक | Rani Lakshmibai | Inspiration | Jhansi Ki Rani | Indian History


⚔️ रानी लक्ष्मीबाई – वीरता, स्वतंत्रता और अदम्य साहस की प्रतीक

 Rani Lakshmibai – A Symbol of Valor, Freedom, and Indomitable Courage

🌺 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जब भी लिखा जाएगा,

उसमें रानी लक्ष्मीबाई का नाम स्वर्ण अक्षरों में सदैव चमकेगा।

वे केवल झांसी की रानी ⚔️ नहीं थीं—

बल्कि नारी शक्ति, राष्ट्रभक्ति और असीम साहस की जीवित प्रतिमा थीं।

उनका जीवन बताता है—

“स्वतंत्रता भीख में नहीं, वीरता से जीती जाती है।”

"Freedom is not won by begging, but by valor ."


👑 जन्म: 19 नवंबर 1828

स्थान: वाराणसी

बचपन का नाम: मणिकर्णिका (मनु)

पिता: मोरोपंत तांबे

माता: भागीरथी बाई


मनु तलवार ⚔️ , घुड़सवारी और युद्धकला में बचपन से ही निपुण थीं।

उन्हें बचपन से ही “बहादुर लड़की” कहा जाता था।


👰 झांसी की रानी 

मनु का विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव से हुआ।

विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई पड़ा।

दत्ता पुत्र दामोदर राव को गोद लेने के बाद,

ब्रिटिश सरकार ने “डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स” लागू कर झांसी हड़पने की कोशिश की।


लेकिन रानी ने स्पष्ट कह दिया—

“मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।”


⚔️ 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम

जब भारत में विद्रोह की अग्नि भड़की,

रानी लक्ष्मीबाई उसके केंद्र में थीं।


उन्होंने झांसी किले को सुरक्षित किया

सेना को संगठित किया

महिलाओं को भी युद्ध का प्रशिक्षण दिया

ब्रिटिश सेना को कड़े संघर्ष में रोका


उनकी रणनीति, उत्साह और नेतृत्व क्षमता ने उन्हें 1857 के विद्रोह का सबसे साहसी चेहरा बना दिया।


🐎 घोड़े पर बैठी शूरवीर रानी

रानी लक्ष्मीबाई की एक हाथ में तलवार और

दूसरे हाथ में दामोदर राव को बाँधकर

युद्धक्षेत्र में कूदने की कथा

आज भी भारतीयों के दिलों में रोमांच भर देती है।


साहस, नारीशक्ति और मातृभूमि के प्रति प्रेम का ऐसा उदाहरण इतिहास में दुर्लभ है।


🌅 बलिदान और अमरत्व

18 जून 1858 को ग्वालियर के पास

रानी लक्ष्मीबाई ने वीरगति प्राप्त की।


परंतु वह हार उनकी महानता और

देश के लिए उनका अमर बलिदान कभी कम नहीं कर सका।


अंग्रेज़ अधिकारी ह्यू रोज़ ने भी माना—

“लक्ष्मीबाई भारत की सबसे बहादुर और ख़तरनाक सेनानायक थीं।”


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।

'झांसी की रानी'  कविता  लेखिका - सुभद्रा कुमारी चौहान महान कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी


सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नई जवानी थी,

गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, 


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


कानपुर के नाना की, मुंहबोली बहन छबीली थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,

नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी, बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथाएं उसकी याद ज़बानी थी,  


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,

नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।

महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,  


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झांसी में, ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झांसी में,

राजमहल में बजी बधाई खुशियां छाई झांसी में, चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई, किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,

तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियां कब भाई,  रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,  


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


बुझा दीप झांसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,  राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,

फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया, लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झांसी आया।

अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झांसी हुई बीरानी थी,


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया, व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,

डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया, राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात, कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,

उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात? जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम गम से थीं बेज़ार,  उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,

सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार, 'नागपूर के जेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,  वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,

नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी, 


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,  यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,

झांसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी, मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम, नाना धुंधूपंत, तांतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,

अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुंवरसिंह सैनिक अभिराम, भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुर्बानी थी,


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


इनकी गाथा छोड़, चले हम झांसी के मैदानों में, जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,

लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुंचा, आगे बड़ा जवानों में, रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।

जख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी, 


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,

यमुना तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,  विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी, अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुंह की खाई थी,

काना और मंदरा सखियां रानी के संग आई थी,  युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार, किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,

घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए अवार, रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी, 


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,


बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।


जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फांसी, हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झांसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।

-सुभद्रा कुमारी चौहान

यह झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के अद्भुत साहस और बलिदान का अमर गान है।


🌟 विशेष हैं रानी लक्ष्मीबाई?

✔️ भारत की पहली महिला योद्धा जिन्होंने अंग्रेजों को चुनौती दी

✔️ नारी शक्ति का सर्वोत्तम उदाहरण

✔️ नेतृत्व, रणनीति और युद्धकौशल में अद्वितीय

✔️ स्वतंत्रता के लिए जीवन का बलिदान

✔️ भारत की राष्ट्रीय चेतना की प्रेरणा


उनका चरित्र भारत की बेटियों के लिए सदैव प्रेरणा स्रोत है।


🕯️ रानी लक्ष्मीबाई हमें क्या सिखाती हैं?

अपने अधिकारों के लिए खड़े हो  Stand up for your rights

डर को कभी हावी मत होने दो  Never let fear overwhelm you

कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद मत छोड़ो Never lose hope even in difficult circumstances

राष्ट्र सर्वोपरि है  Nation is supreme

नारी शक्ति असीमित है  Women's power is limitless


📌   उनका जीवन हर भारतीय को यह संदेश देता है—

“साहस हमेशा जीतता है।” "Courage always wins."


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सूचना:  यंहा दी गई  जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की  कोई गारंटी नहीं है। सूचना के  लिए विभिन्न माध्यमों से संकलित करके लेखक के निजी विचारो  के साथ यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह  की जिम्मेदारी स्वयं निर्णय लेने वाले पाठक की ही होगी।' हम या हमारे सहयोगी  किसी भी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं है | धन्यवाद। ... 

Notice: There is no guarantee of authenticity or reliability of the information/content/calculations given here. This information has been compiled from various mediums for information and has been sent to you along with the personal views of the author. Our aim is only to provide information, readers should take it as information only. Apart from this, the responsibility of any kind will be of the reader himself who takes the decision. We or our associates are not responsible for this in any way. Thank you.

15 नवंबर 2025

बिरसा मुंडा | धरती आबा — स्वतंत्रता संग्राम के महानायक | जनजातीय गौरव दिवस | Birsa Munda — The Great Hero of the Tribal Freedom Struggle

 


'धरती आबा' भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती 'जनजातीय गौरव दिवस'

🌟 बिरसा मुंडा — स्वतंत्रता संग्राम के महानायक (Indian History / Tribal Hero / Freedom Fighter)

भगवान बिरसा मुंडा जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी एक आध्यात्मिक सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर, उन्होंने मुंडा जनजातियों को ब्रिटिश भूमि कानूनों और सामंती शोषण के खिलाफ एकजुट किया। धरती आबा ("पृथ्वी के पिता") के रूप में प्रसिद्ध बिरसा मुंडा ने औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त एक नैतिक, स्व-शासित समाज की कल्पना की।

🔱 भारत की स्वतंत्रता का इतिहास केवल दिल्ली, लखनऊ या कोलकाता की लड़ाइयों तक सीमित नहीं है। इस इतिहास के पन्नों में एक ऐसा नाम दर्ज है जिसने जंगलों, पहाड़ों और असमानताओं के बीच सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता और आदिवासी अस्मिता की लौ जगाई — वह नाम है धरती आबा — बिरसा मुंडा। “उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता केवल ज़मीन की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की लड़ाई भी है।” 👑 कौन थे बिरसा मुंडा? बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के ऊलीहातु गाँव में हुआ था। वे मुंडा जनजाति से थे, जो प्रकृति, भूमि और संस्कृति से गहराई से जुड़ी है। बिरसा मुंडा बचपन से ही तेज, साहसी और नेतृत्व क्षमता से भरे हुए थे। गरीबी, ब्रिटिश शासन और जमींदारी प्रथाओं ने उनके भीतर विद्रोह की चिंगारी जगाई। 🔥 बिरसा आंदोलन (Ulgulan – The Great Tumult) बिरसा मुंडा ने आदिवासी समाज के अधिकार, भूमि और सम्मान के लिए उलगुलान आंदोलन (बड़ा विद्रोह) चलाया। यह आंदोलन तीन प्रमुख मुद्दों पर आधारित था: ✔️ ज़मीन पर अधिकार ✔️ ब्रिटिश अत्याचार का विरोध ✔️ आदिवासी संस्कृति की रक्षा उन्होंने लोगों को संगठित किया, प्रेरित किया और एकजुट होकर लड़ने का साहस दिया। “धरती हमारी है – हम ही इसके असली मालिक हैं।” ⚔️ ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों की अन्यायपूर्ण राजस्व नीति, वन कानून और बलपूर्वक जबरन मजदूरी का खुलकर विरोध किया। उन्होंने गाँव–गाँव जाकर जनजागरण किया आदिवासियों को शिक्षा, स्वाभिमान और संगठन का संदेश दिया ब्रिटिश सरकार की नींद हराम कर दी उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि ब्रिटिश सरकार उन्हें “सबसे खतरनाक विद्रोही” मानने लगी। ⚡ बिरसा का सामाजिक सुधार वे केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं, एक सामाजिक सुधारक भी थे। उन्होंने आदिवासी समाज में फैल रही कुरीतियाँ, अज्ञानता और अंधविश्वास के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने लोगों को सिखाया: स्वच्छता समाज सुधार धर्म और संस्कृति की रक्षा एकता और भाईचारा 🌿 उनका दर्शन: धरती आबा बिरसा मुंडा को लोग धरती आबा (Father of the Earth) कहते हैं। क्योंकि वे प्रकृति, जंगल, भूमि और मानव के बीच अमिट संबंध का संदेश देते थे। उनकी सोच थी — “जंगल हमारी सांस है, और धरती हमारा जीवन।” “The forest is our breath, and the earth is our life.” 🕊️ बलिदान बिरसा मुंडा को ब्रिटिश शासन ने गिरफ्तार कर लिया और 9 जून 1900 को रांची जेल में मात्र 25 वर्ष की आयु में संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। उनका जीवन छोटा था, लेकिन प्रभाव अमर है। 🌟 बिरसा मुंडा का प्रभाव और विरासत झारखंड राज्य गठन में उनकी भूमिका प्रेरणा बनी कई संस्थानों, विश्वविद्यालयों, स्टेडियमों, योजनाओं का नाम उनके नाम पर भारत सरकार हर वर्ष 15 नवंबर को “जनजातीय गौरव दिवस” मनाती है वे आज भी आदिवासी आंदोलन, सामाजिक अधिकार, पर्यावरण संरक्षण और मानव गरिमा के अद्वितीय प्रतीक हैं। 🔱 बिरसा मुंडा ने सिखाया कि– ✅ “नायक वही है जो अपने लोगों के लिए, अपनी धरती के लिए, और अपने सम्मान के लिए खड़ा हो सके।” ✅ "A hero is one who can stand up for his people, for his land, and for his honor." उनका जीवन संघर्ष, साहस और आत्मसम्मान की प्रेरक कहानी है। वे भारत की स्वतंत्रता यात्रा के सच्चे नायक हैं। His life is an inspiring story of struggle, courage, and self-respect. He is a true hero of India's freedom journey. #बिरसा_मुंडा #BirsaMunda #धरतीआबा #Ulgulan #TribalHero #JanJatiyaGauravDiwas #IndianHistory #FreedomFighter #AdivasiWarrior #MundaTribe #JharkhandPride #BharatKeNayak #IndianLegend #AdivasiAndolan #Virasat #BharatKaGaurav #TribalRevolution #BirsaMovement #SanatanHistory #IndianCulture #Inspiration


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13 नवंबर 2025

ब्रह्मगुप्त | Brahmagupta | भारत के महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री | India's Great Mathematician and Astronomer


🌟 ब्रह्मगुप्त — भारत के महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री  | Vedic Mathematics | Ancient Indian Science


🔱 भारत की भूमि ने अनेक महान गणितज्ञ और वैज्ञानिक दिए हैं —

उनमें से एक हैं ब्रह्मगुप्त (Brahmagupta),

जिन्होंने न केवल गणित को नई ऊँचाइयाँ दीं,

बल्कि बीजगणित, अंकगणित और खगोलशास्त्र की नींव को मजबूत किया।


“ब्रह्मगुप्त ने गणित को तर्क, सूत्र और खगोलीय ज्ञान से जोड़कर एक विज्ञान का रूप दिया।”


👑 आचार्य ब्रह्मगुप्त का जन्म राजस्थान राज्य के भीनमाल (प्राचीन भिल्लमाल) शहर मे 598 ई. मे हुआ था। इसी कारण उन्हें ' भिल्लमालाआचार्य ' के नाम से भी कई जगह उल्लेखित किया गया है। यह शहर तत्कालीन गुजरात प्रदेश की राजधानी तथा हर्षवर्धन साम्राज्य के राजा व्याघ्रमुख के समकालीन माना जाता है।ब्रह्मगुप्त आबू पर्वत तथा लुणी नदी के बीच स्थित, भीनमाल नामक ग्राम के निवासी थे। इनके पिता का नाम जिष्णु था। 

वे भारतीय गणित के स्वर्ण युग के महान प्रतिनिधि थे।


उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें —

📘 “ब्रह्मस्फुटसिद्धांत” (Brahmasphutasiddhanta)

📘 “खण्डखाद्यक” (Khandakhadyaka)

आज भी गणित और खगोल विज्ञान के अद्भुत ग्रंथ माने जाते हैं।


🧠 ब्रह्मगुप्त के प्रमुख योगदान

✅  शून्य और ऋण संख्याओं का उपयोग


ब्रह्मगुप्त ने पहली बार शून्य (Zero) और ऋण (Negative) संख्याओं के साथ गणना के नियम बताए।

उन्होंने यह स्पष्ट किया कि:


“जब किसी संख्या से वही संख्या घटाई जाती है, परिणाम शून्य होता है।”


और ऋण संख्याओं के जोड़-घटाव के नियम दिए —

जो आज के आधुनिक गणित का मूल आधार हैं।


✅  बीजगणित (Algebra) का विस्तार


उन्होंने बीजगणितीय समीकरणों के हल (Solutions) और सूत्रों की संरचना दी।

“x² + bx = c” जैसे quadratic equations के सिद्धांत उन्होंने बहुत पहले प्रस्तुत किए।


वे पहले गणितज्ञ थे जिन्होंने algebra को एक स्वतंत्र शाखा बनाया।


✅  खगोल विज्ञान में योगदान


ब्रह्मगुप्त ने ग्रहों की स्थिति, कक्षाओं और ग्रहणों की गणना के सटीक सूत्र दिए।

उन्होंने पृथ्वी को गोलाकार (Spherical) बताया और उसकी परिधि का सटीक अनुमान लगाया।


✅  त्रिकोणमिति और क्षेत्रफल सूत्र


उन्होंने त्रिभुज, वृत्त और चतुर्भुजों के क्षेत्रफल निकालने के नियम बताए।

ब्रह्मगुप्त सूत्र (Brahmagupta’s Formula) आज भी प्रसिद्ध है:


किसी चतुर्भुज का क्षेत्रफल = √((s–a)(s–b)(s–c)(s–d))

जहाँ s = (a+b+c+d)/2


यह सूत्र आज भी geometry में उपयोग होता है।


✅  ग्रहण सिद्धांत (Eclipse Theory)

उन्होंने सूर्य और चंद्र ग्रहण के वैज्ञानिक कारण बताए —यह खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।


🌍 विश्व में प्रभाव

ब्रह्मगुप्त के सिद्धांतों का अरबी और यूनानी विद्वानों ने अनुवाद किया।

उनके विचारों ने इस्लामी गणित और आगे चलकर यूरोपीय विज्ञान को दिशा दी।

उनके कार्य ने विश्व को बताया कि गणित का असली जन्मस्थान भारत है।

✅  “Zero और Algebra — दोनों की जड़ें भारत के ब्रह्मगुप्त के सिद्धांतों  में हैं।”


🔱  ब्रह्मगुप्त केवल एक गणितज्ञ नहीं थे —

वे वह सेतु थे, जिन्होंने वेदों की ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान से जोड़ा।

“जहाँ से शून्य निकला, वहीं से अनंत की यात्रा शुरू हुई —और उस यात्रा के मार्गदर्शक थे ब्रह्मगुप्त।”



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01 अप्रैल 2024

How our Gurukuls were closed | हमारे गुरुकुल कैसे बन्द हुए | लेखक : नलीन चंद्र

 




इंग्लैंड में पहला स्कूल school 1811 में खुला उस समय भारत में 7,32,000 #गुरुकुल #Gurukul  थे, आइए जानते हैं हमारे गुरुकुल #Gurukul कैसे बन्द हुए।

हमारे #सनातन #Sanatan #संस्कृति #cultural #परम्परा #tradition   के गुरुकुल में क्या क्या पढाई होती थी, ये जान लेना पहले जरूरी है।

01 अग्नि विद्या (#Metallurgy) 

02 वायु विद्या (#Flight) 

03 जल विद्या (#Navigation) 

04 अंतरिक्ष विद्या (#Space_Science) 

05 पृथ्वी विद्या (#Environment) 

06 सूर्य विद्या (#Solar_Study) 

07 चन्द्र व लोक विद्या (#Lunar_Study) 

08 मेघ विद्या (#Weather_Forecast) 

09 पदार्थ विद्युत विद्या (#Battery) 

10 सौर ऊर्जा विद्या (#Solar_Energy) 

11 दिन रात्रि विद्या 

12 सृष्टि विद्या (#Space Research) 

13 खगोल विद्या (#Astronomy) 

14 भूगोल विद्या (#Geography) 

15 काल विद्या (#Time) 

16 भूगर्भ विद्या (#Geology #Mining) 

17 रत्न व धातु विद्या (#Gems & #Metals) 

18 आकर्षण विद्या (#Gravity) 

19 प्रकाश विद्या (#Solar #Energy) 

20 तार विद्या (#Communication) 

21 विमान विद्या (#Plane) 

22 जलयान विद्या (#Water #Vessels) 

23 अग्नेय अस्त्र विद्या (#Arms & #Ammunition) 

24 जीव जंतु विज्ञान विद्या (#Zoology #Botany) 

25 यज्ञ विद्या (#Material #Sic) 


ये तो बात हुई #वैज्ञानिक विद्याओं की, अब बात करते हैं #व्यावसायिक और #तकनीकी विद्या की।


26 वाणिज्य (#Commerce) 

27 कृषि (#Agriculture) 

28 पशुपालन (#Animal #Husbandry) 

29 पक्षिपलन (#Bird Keeping) 

30 पशु प्रशिक्षण (#Animal #Training) 

31 यान यन्त्रकार (#Mechanics) 

32 रथकार (#Vehicle #Designing) 

33 रतन्कार (#Gems) 

34 सुवर्णकार (#Jewellery #Designing) 

35 वस्त्रकार (#Textile) 

36 कुम्भकार (#Pottery) 

37 लोहकार (#Metallurgy) 

38 तक्षक 

39 रंगसाज (#Dying) 

40 खटवाकर 

41 रज्जुकर (#Logistics) 

42 वास्तुकार (#Architect) 

43 पाकविद्या (#Cooking) 

44 सारथ्य (#Driving) 

45 नदी प्रबन्धक (#Water #Management) 

46 सुचिकार (#Data #Entry) 

47 गोशाला प्रबन्धक (#Animal #Husbandry) 

48 उद्यान पाल (#Horticulture) 

49 वन पाल (#Forestry) 

50 नापित (#Paramedical)


जिस देश के गुरुकुल इतने समृद्ध हों उस देश को आखिर कैसे गुलाम बनाया गया होगा ?


मैकाले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी “देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था” को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह “अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था” लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे।

1850 तक इस देश में “7 लाख 32 हजार” गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे “7 लाख 50 हजार” मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में ‘#Higher #Learning #Institute’ हुआ करते थे। उन सबमें 18 विषय पढ़ाए जाते थे और ये गुरुकुल समाज के लोग मिलके चलाते थे न कि राजा, महाराजा।

अंग्रेजों का एक अधिकारी था #G.W. #Luther और दूसरा था #Thomas #Munro ! दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था। #Luther, जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और #Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ तो 100% साक्षरता है।

मैकाले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है–

“कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले उसे पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।”


इस लिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया। जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज की तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया, उनमें आग लगा दी, उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला।


गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी। इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया। उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था। इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी, ये तीनों गुलामी ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी देश में मौजूद हैं।


मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमें वो लिखता है कि-


“इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।”


उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ साफ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, जबकि अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, हम तो खुद में हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, उस देश का कैसे कल्याण संभव है ?


हमारी पुरानी शिक्षा पद्धति बहुत ही समृद्ध और विशाल थी और यही कारण था कि हम विश्वगुरु थे। हमारी शिक्षा पद्धति से पैसे कमाने वाले मशीन पैदा नहीं होते थे बल्कि मानवता के कल्याण हेतु अच्छे और विद्वान इंसान पैदा होते थे। आज तो जो बहुत पढ़ा लिखा है वही सबसे अधिक भ्रष्ट है, वही सबसे बड़ा चोर है।


हमने अपना इतिहास गवां दिया है। क्योंकि अंग्रेज हमसे हमारी पहचान छीनने में सफल हुए। उन्होंने हमारी शिक्षा पद्धति को बर्बाद कर के हमें अपनी संस्कृति, मूल धर्म, ज्ञान और समृद्धि से अलग कर दिया।


आज जो स्कूलों और कॉलेजों का हाल है वो क्या ही लिखा जाए ! हम न जाने ऐसे लोग कैसे पैदा कर रहें हैं जिनमें जिम्मेवारी का कोई एहसास नहीं है। जिन्हें सिर्फ़ पद और पैसों से प्यार है। हम इतने असफल कैसे होते जा रहें हैं ?


किसी भी समाज की स्थिति का अनुमान वहां के शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति से लगाया जा सकता है। आज हम इसमें बहुत असफल हैं। हमने स्कूल और कॉलेज तो बना लिए लेकिन जिस उद्देश्य के लिए इसका निर्माण हुआ उसकी पूर्ति के योग्य इंसान और सिस्टम नहीं बना पाए।


जब आप अपने देश का इतिहास पढ़ेंगे तो आप गर्व भी महसूस करेंगे और रोएंगे भी क्योंकि आपने जो गवां दिया है वो पैसों रुपयों से नहीं खरीदा जा सकता।


हमें एक बड़े पुनर्जागरण की जरूरत है। सरकारें आएंगी जाएंगी, इनसे बहुत उम्मीद करना बेवकूफी होगी, जनता जब तक नहीं जागती हम अपनी विरासत को कभी पुनः हासिल नहीं कर पाएंगे।

जागना होगा और कोई विकल्प नहीं।

"लेखक के निजी विचार हैं "

 







लेखक : नलीन चंद्र  (Naleen Chandra)  01/04/2024 


सूचना:  यंहा दी गई  जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की  कोई गारंटी नहीं है। सूचना के  लिए विभिन्न माध्यमों से संकलित करके लेखक के निजी विचारो  के साथ यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह  की जिम्मेदारी स्वयं निर्णय लेने वाले पाठक की ही होगी।' हम या हमारे सहयोगी  किसी भी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं है | धन्यवाद। ... 

Notice: There is no guarantee of authenticity or reliability of the information/content/calculations given here. This information has been compiled from various mediums for information and has been sent to you along with the personal views of the author. Our aim is only to provide information, readers should take it as information only. Apart from this, the responsibility of any kind will be of the reader himself who takes the decision. We or our associates are not responsible for this in any way. Thank you. ,

24 मार्च 2024

| पंडित हरिभाऊ उपाध्याय | साहित्यकार तथा स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रसेवी | 24 मार्च, 1892 - 25 अगस्त, 1972

 


हरिभाऊ उपाध्याय का जन्म 24 मार्च, 1892 को मध्य प्रदेश में #उज्जैन ज़िले के #भौंरोसा नामक गाँव में हुआ था। विद्यार्थी जीवन से ही उनके मन में साहित्य के प्रति चेतना जाग्रत हो गई थी। संस्कृत के नाटकों तथा अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध उपन्यासों के अध्ययन के बाद वे उपन्यास लेखन की  और अग्रसर हुए।

🇮🇳 हरिभाऊ उपाध्याय ने हिन्दी सेवा से सार्वजनिक जीवन शुरू किया और  सबसे पहले  ‘औदुम्बर’ मासिक पत्र के प्रकाशन द्वारा हिन्दी पत्रकारिता जगत में पर्दापण किया। सबसे पहले  1911 में वे ‘औदुम्बर’ के सम्पादक बने। पढ़ते-पढ़ते ही इन्होंने इसके सम्पादन का कार्य भी आरम्भ किया। ‘औदुम्बर’ में कई विद्वानों के विविध विषयों से सम्बद्ध पहली बार लेखमाला निकली, जिससे हिन्दी भाषा की स्वाभाविक प्रगति हुई। इसका श्रेय हरिभाऊ के उत्साह और लगन को ही जाता है। 1915  में हरिभाऊ उपाध्याय #महावीर_प्रसाद_द्विवेदी के सान्निध्य में आये। हरिभाऊ जी खुद लिखते हैं कि- “औदुम्बर की सेवाओं ने मुझे आचार्य द्विवेदी जी की सेवा में पहुँचाया।” द्विवेदी जी के साथ ‘सरस्वती’ में कार्य करने के बाद हरिभाऊ उपाध्याय ने ‘प्रताप’, ‘हिन्दी नवजीवन’ और ‘प्रभा’ के सम्पादन में योगदान दिया और स्वयं ‘मालव मयूर’ नामक पत्र निकालने की योजना बनायी। लेकिन यह पत्र अधिक दिन नहीं चल सका।

🇮🇳 हरिभाऊ उपाध्याय की हिन्दी साहित्य को विशेष देन उनके द्वारा बहुमूल्य पुस्तकों का रूपांतरण है। कई मौलिक रचनाओं के अलावा उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की ‘मेरी कहानी’ और पट्टाभि सीतारमैया द्वारा लिखित ‘कांग्रेस का इतिहास’ का हिन्दी में अनुवाद किया। हरिभाऊ जी का प्रयास हमें भारतेन्दु काल की याद दिलाता है, जब प्राय: सभी हिन्दी लेखक बंगला से हिन्दी में अनुवाद करके साहित्य की अभिवृद्धि करते थे। अनुवाद करने में भी उन्होंने इस बात का सदा ध्यान रखा कि पुस्तक की भाषा लेखक की भाषा और उसके व्यक्तित्व के अनुरूप हो। अनुवाद पढ़ने से यह अनुभव नहीं होता कि अनुवाद पढ़ रहे हैं। यही अनुभव होता है कि मानो स्वयं मूल लेखक की ही वाणी और विचारधारा अविरल रूप से उसी मूल स्त्रोत से बह रही है। इस प्रकार हरिभाऊ जी ने अपने साथी जननायकों के ग्रंथों का अनुवाद करके हिन्दी साहित्य को व्यापकता प्रदान की।

🇮🇳 हरिभाऊ उपाध्याय की अनेक पुस्तकें आज हिन्दी साहित्य जगत को प्राप्त हो चुकी हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं-

• ‘बापू के आश्रम में’

• ‘स्वतंत्रता की ओर’

• ‘सर्वोदय की बुनियाद’

• ‘श्रेयार्थी जमनालाल जी’

• ‘साधना के पथ पर’

• ‘भागवत धर्म’

• ‘मनन’

• ‘विश्व की विभूतियाँ’

• ‘पुण्य स्मरण’

• 'प्रियदर्शी अशोक’

• ‘हिंसा का मुकाबला कैसे करें’

• ‘दूर्वादल’ (कविता संग्रह)

• ‘स्वामी जी का बलिदान’

• ‘हमारा कर्त्तव्य और युगधर्म’

🇮🇳 ☝️इन सभी रचनाओं से हिन्दी साहित्य निश्चित ही समृद्ध हुआ है। हरिभाऊ जी की रचनाएँ भाव, भाषा और शैली की दृष्टि से बड़ी आकर्षक हैं। इनमें रस है, मधुरता और उज्ज्वलता है। इनमें सत्य और अहिंसा की शुभ्रता है, धर्म की समंवयबुद्धि है और लेखनी की सतत साधना और प्रेरणा है।

🇮🇳 #महात्मा_गाँधी से प्रभावित होकर हरिभाऊ उपाध्याय ‘भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन’ में कूद पड़े थे। पुरानी अजमेर रियासत में इन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे अजमेर के मुख्यमंत्री निर्वाचित हुए थे। हरिभाऊ जी हृदय से ये अत्यंत कोमल थे, लेकिन सिद्धांतों के साथ कोई समझौता नहीं करते थे। राजस्थान की सब रियासतों को मिलाकर राजस्थान राज्य बना और इसके कई वर्षों बाद मोहनलाल सुखाड़िया मुख्यमंत्री बने थे। उन्होंने अत्यंत आग्रहपूर्वक हरिभाऊ उपाध्याय को पहले वित्त फिर शिक्षामंत्री बनाया था। बहुत दिनों तक वे इस पद पर रहे, लेकिन स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण त्यागपत्र दे दिया। हरिभाऊ उपाध्याय कई वर्षों तक राजस्थान की ‘शासकीय साहित्य अकादमी’ के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने ‘महिला शिक्षा सदन’, हटूँडी (अजमेर) और ‘सस्ता साहित्य मंडल’ की स्थापना की थी।

🇮🇳 हरिभाऊ उपाध्याय  25 अगस्त, 1972 को मृत्यु हो गई ।

🇮🇳 #भारत के प्रसिद्ध #साहित्यकार तथा #स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रसेवी #पंडित_हरिभाऊ_उपाध्याय जी को उनकी जयंती पर हार्दिक श्रद्धांजलि !

#Pandit_Haribhau_Upadhyay ji

🇮🇳💐🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

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Radhikaraman Prasad Singh | राधिकारमण प्रसाद सिंह | पद्मभूषण तथा साहित्य वाचस्पति की उपाधि से अलंकृत साहित्यकार |




 जब वक्त्त गुजर जाता है तो याद बनती है. किसी बाग की खुशबू निकल जाए तो फूल खिलने की फरियाद आती है. इसी तरह आज साहित्य नगरी #सूर्यपुरा का स्वर्णिम अतीत सिर्फ यादों में सिमटकर रह गया है. साहित्याकाश के दीप्तिमान नक्षत्र राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह का किला आज भले ही रख रखाव के अभाव में खंडहर में तब्दील होने लगा हो परंतु लाहौरी ईट से बना यह किला आज भी राजा साहब की याद को ताजा करता है.

🇮🇳🔰 राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह का जन्म 10 सितम्बर 1890 को तत्कालीन #शाहाबाद जिला के #बिक्रमगंज के #सूर्यपुरा ग्राम के एक कायस्थ परिवार में हुआ था. बड़े जमींदार होने की वजह से अपने नाम के साथ सिंह लगाते थे. इनके पिता #राज_राजेश्वरी_प्रसाद_सिंह हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, बंग्ला, फ़ारसी तथा पश्तो के विद्वान होने के साथ ब्रज भाषा के एक बड़े कवि भी थे. राधिका रमण प्रसाद के पितामह #दीवान_राम_कुमार_सिंह साहित्यक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे और कुमार उपनाम से ब्रज भाषा मे कविताएं लिखा करते थे. ये कहना गलत नही होगा कि राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह को साहित्य विरासत में मिला था.

🇮🇳🔰 उनकी प्राम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई. घर पर ही उन्होंने संस्कृत हिन्दी और अंग्रेजी की प्राम्भिक शिक्षा पूर्ण की. 1903 ई. में पिता के अचानक स्वर्गवास होने पर इनकी रियासत कोर्ट ऑफ वांडर्स के अधीन हो गई. शाहाबाद के कलक्टर के अभिभाकत्व में उन्होंने आरा जिला स्कूल में दाखिला लिया. कुछ ही दिन बाद जिलाधिकारी ने उन्हे कलकत्ता भेज दिया. वही से उन्होने दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की. उस समय तक उन्होंने ब्रजभाषा में कविता लिखना शुरू कर दिया था. #बंगभंग_आंदोलन से प्रभावित होने के कारण जिलाधिकारी ने आगरा कॉलेज, आगरा में उनका नाम लिखवा दिया. वहाँ से उन्होने एफ.ए. (इंटरमीडिएट)किया. 1912 ई. में प्रयाग विश्वविद्यालय से बीए का परीक्षा पास किए. उसी समय उनकी प्रथम कहानी कानों में कंगना इन्दु में प्रकाशित हुई. 1914 ई. में कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. (इतिहास) की परीक्षाएं पास कीं.

🇮🇳🔰 1917 ई. में जब वे बालिग हुए, तब रियासत ‘कोर्ट ऑव वार्ड्स’ के बंधन से मुक्त हुए और वे उसके स्वामी हो गए. सन् 1920 ई. के आसपास अंग्रेजी सरकार ने राधिकारमण प्रसाद सिंह को ‘राजा’ की उपाधि से विभूषित किया. इसी बीच उन्हें बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया. 1921 ई. में उन्हें शाहाबाद जिला परिषद के डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के प्रथम भारतीय चेयरमैन के रूप में निर्वाचित किया. 28 फरवरी 1927 को उन्होंने जिला बोर्ड के तत्वावधान में #महात्मा_गाँधी का अभिनन्दन किया. 1932 ई. में बिहार हरिजन सेवा संघ के अध्यक्ष बनाए गए. 1941 ई. में उन्हें अग्रेजी सरकार ने सी.आई.ई. की पदवी से विभूषित किया.

🇮🇳🔰 1947 ई. भारतीय स्वंतत्रता के बाद राजा साहब पटना में रहने लगे और साहित्य साधना में लग गए. हिन्दी साहित्य की उल्लेखनीय उपाधि और 1962 ई. में  भारत सरकार ने पद्म भूषण की उपाधि और 1969 ई. में मगध विश्वविद्यालय, बोध गया ने डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (डी.लिट्) की मानक उपाधि से सम्मानित किया. 1970 ई में प्रयाग हिन्दी साहित्य सम्मेलन में साहित्यवाचस्पति की उपाधि से अलंकृत किया गया. 24 मार्च 1971 ई. को वो हिन्दी साहित्य की गोद में सदैव के लिए ध्यान मग्न हो गए.

🇮🇳🔰 उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं:-

🔰 नाटक:- (1) ‘नये रिफारमर’ या ‘नवीन सुधारक’ (सन् 1911 ई.), (2) ‘धर्म की धुरी’ (सन् 1952 ई.), (3) ‘अपना पराया’ (सन् 1953 ई.) और (4) ‘नजर बदली बदल गये नजारे’ (सन् 1961 ई.)।

🔰 कहानी संग्रह:- ‘कुसुमांजली’ (सन् 1912 ई.)। लघु उपन्यास:- (1) ‘नवजीवन’ (सन् 1912 ई), (2) ‘तरंग’ (सन् 1920 ई.), (3) ‘माया मिली न राम’ (सन् 1936 ई.), (4) ‘मॉडर्न कौन, सुंदर कौन’ (सन् 1964 ई.), और (5) ‘अपनी-अपनी नजर’, ‘अपनी-अपनी डगर’ (सन् 1966 ई.)।

🔰 उपन्यास:- (1) ‘राम-रहीम’ (सन् 1936 ई.), (2) ‘पुरुष और नारी’ (सन् 1939 ई.), (3) ‘सूरदास’ (सन् 1942 ई.), (4) ‘संस्कार’ (सन् 1944 ई.), (5) ‘पूरब और पश्चिम’ (सन् 1951 ई.), (6) ‘चुंबन और चाँटा’ (सन् 1957 ई.)

🔰 कहानियाँ:- (1) ‘गाँधी टोपी’ (सन् 1938 ई.), (2) ‘सावनी समाँ’ (सन् 1938 ई.), (3) ‘नारी क्या एक पहेली? (सन् 1951 ई.), (4) ‘हवेली और झोपड़ी’ (सन् 1951 ई.), (5) ‘देव और दानव’ (सन् 1951 ई.), (6) ‘वे और हम’ (सन् 1956 ई.), (7) ‘धर्म और मर्म’ (सन् 1959 ई.) (😎 ‘तब और अब’ (सन् 1958 ई.), (9) ‘अबला क्या ऐसी सबला?’ (सन् 1962 ई.), (10) ‘बिखरे मोती’ (भाग-1) (सन् 1965 ई.)।

🔰 संस्मरण:- (1) ‘टूटा तारा’ (1941), (2) ‘बिखरे मोती’ (भाग-2, 3) (1966)।

रिपोर्ट- जयराम

साभार : rohtasdistrict.com

🇮🇳 #पद्मभूषण तथा साहित्य वाचस्पति की उपाधि से अलंकृत; हिंदी के सुप्रसिद्ध #साहित्यकार #राजा_राधिकारमण_प्रसाद_सिंह जी को उनकी पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि !

#Raja_Radhikaman_Prasad_Singh ji

#literateur

#padmabhushan


🇮🇳💐🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

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23 मार्च 2024

Basanti Devi | स्वतंत्रता आंदोलन की अमर सेनानी बसंती देवी | 23 मार्च 1880 - 7 मई 1974

 





1925 में अपने पति #देशबंधु_चित्तरंजन_दास के देहांत के बाद भी #बसंती_देवी बराबर राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेती रहीं। 🇮🇳

🇮🇳 बसंती देवी (जन्म: 23 मार्च, 1880, कोलकाता; मृत्यु: 7 मई 1974) भारत की स्वतंत्रता सेनानी और बंगाल के प्रसिद्ध नेता #चित्तरंजन_दास की पत्नी थीं। राष्ट्रपिता #महात्मा_गाँधी द्वारा आरंभ किए गये #असहयोग_आंदोलन में भी ये सम्मिलित हुईं। लोगों में #खादी का प्रचार करने के अभियोग में इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था।

🇮🇳 बंगाल के प्रसिद्ध नेता चित्तरंजन दास की पत्नी बसंती देवी का जन्म 23 मार्च, 1880 ई. को #कोलकाता (पूर्व नाम कलकत्ता) में हुआ। बचपन में ये अपने पिता के साथ #असम में रहती थीं तथा आगे की शिक्षा के लिए कोलकाता आ गईं। यहीं 1897 में इनका बैरिस्टर चित्तरंजन दास के साथ विवाह हुआ।

🇮🇳 बसंती देवी भी स्वतंत्रता सेनानी थीं, जब 1917 में चित्तरंजन दास राजनीति में कूद पड़े तो बसंती देवी ने भी पूरी तरह से उनका साथ दिया। गाँधी जी द्वारा आरंभ किए गये 'असहयोग आंदोलन' में ये सम्मिलित हुईं। इनके द्वारा लोगों में खादी का प्रचार करने के अभियोग में इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और इसके बाद ही 1921 में इनके पति और पुत्र भी पकड़ लिये गये। लोगों में खादी के प्रचार के अभियोग में बसंती देवी की गिरफ्तारी का लोगों ने बहुत विरोध किया। देश के अनेक प्रमुख बैरिस्टरों ने भी इसके विरोध में आवाज़ उठाई औ #बसंती_देवी जी र मामला वाइसराय तक ले गए। जहाँ इसके बाद सरकार ने इन्हें रिहा कर दिया।

🇮🇳 जेल से बाहर आने पर भी बसंती देवी ने विदेशी शासन का विरोध जारी रखा। ये देश के विभिन्न स्थानों में गईं और लोगों को चित्तरंजन दास के राजनीतिक विचारों से परिचित कराया। 1922 में चित्तरंजन दास, #मौलाना_अबुल_कलाम_आज़ाद, #सुभाष_चंद्र_बोस आदि गिरफ्तार कर लिए गए। चित्तरंजन दास को चटगाँव राजनीतिक सम्मेलन की अध्यक्षता करनी थीं। परंतु उनकी गिरफ्तारी पर बसंती देवी ने स्वयं इस सम्मेलन की अध्यक्षता की।

🇮🇳 1925 में देशबंधु चित्तरंजन दास का देहांत हो गया। इसके बाद भी बसंती देवी बराबर राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेती रहीं और 1974 में इनका देहांत हो गया।

साभार: bharatdiscovery.org

🇮🇳 #पद्मविभूषण से सम्मानित; भारत के #स्वतंत्रता आंदोलन की अमर सेनानी #बसंती_देवी जी को उनकी जयंती पर कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि !

#Basanti_devi ji

🇮🇳💐🙏

🇮🇳 वन्दे मातरम् 🇮🇳

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

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Dr. Ram Manohar Lohia | डॉ. राम मनोहर लोहिया | 23 March 1910 – 12 October 1967

 




किसी देश का उत्थान जनता की चेतना और राजनीतिक जागरूकता पर निर्भर करता है। 🇮🇳 

🇮🇳 आज देश के महानायक भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और डॉ. राम मनोहर लोहिया को एक साथ याद करने का दिन है। 23 मार्च को जहाँ भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के बलिदान का दिन है तो वहीं महान समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया की जयंती भी है।

🇮🇳 डॉ. लोहिया एक ऐसे चिंतक और नेता थे, जिन्होंने अपने जन्मदिन को बलिदान दिवस (शहीदी दिवस) को समर्पित कर दिया। वे कहते थे कि यह जन्मदिन से अधिक अपने महानायकों को याद करने का दिन है, जो बहुत कम उम्र में बलिदान देकर समाज को एक बड़ा सपना दे गया। ऐसे बलिदान समाज में एक नई सोच और सपने देखने के नजरिए को प्रतिफलित करती हैं, उस सपने को आगे बढ़ाने का दिन है।

🇮🇳 उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों के बलिदानों के बाद खुद का जन्मदिन मनाने से इनकार कर दिया और अपने समाजवादी साथियों से यह अपील की कि वह भी उसे न मनाएं । अगर कोई उनसे जन्मदिन मनाने का आग्रह करता तो वह स्पष्ट रूप से कहते थे कि भगत सिंह और उनके साथियों के बलिदानों को याद करना चाहिए और इस दिन को हमें बलिदान दिवस के रूप में मनाना चाहिए।

🇮🇳 इतने कम उम्र में भगत सिंह जितना लिख गए और पढ़ गए वह अद्भुत है। उनकी लेखनी में समाज के हाशिए पर खड़े लोगों की झलक दिखती है। आज हमारे समाज को भगत सिंह और डॉ. राम मनोहर लोहिया के त्याग, विचार और संदेश को आत्मसात करने की जरूरत है।

डॉ. लोहिया और भगत सिंह की कार्य प्रणाली, व्यक्तित्व, सोच एवं जीवन दर्शन में कई समानताएं देखने को मिलती हैं। दोनों का लक्ष्य था कि एक ऐसे समाज की स्थापना की जाए, जिसमें शोषण न हो, भेदभाव न हो, असमानता न हो, किसी प्रकार का अप्राकृतिक अथवा अमानवीय विभेद न हो। अर्थात समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना की जाए।

🇮🇳 दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि समाज में व्यक्ति-व्यक्ति के बीच कोई भेद एवं कोई दीवार न हो, न ही जाति का बंधन हो और न ही धर्म की बंदिशें हो, सभी जन एक समान हों और सब जन का मंगल हो।

🇮🇳 वहीं मौजूदा हालात ऐसे हैं, जिसमें सभी का मंगल बाधित होता दिख रहा है। देश में बढ़ती बेरोजगारी, महँगाई, छात्र-छात्राओं में हताशा की किरणें और आए दिन राजनीतिक परिदृश्य में परिवर्तन इस ओर इशारा करती हैं कि राम मनोहर लोहिया की समाजवादी विचारधारा आज भी प्रासंगिक है।

उन्होंने कहा था कि-

जो लोग ये कहते हैं कि राजनीति को रोजी-रोटी की समस्या से अलग रखो तो यह कहना उनकी अज्ञानता है या बेईमानी है। राजनीति का अर्थ और प्रमुख उद्देश्य लोगों का पेट भरना है। जिस राजनीति से लोगों को रोटी नहीं मिलती, उनका पेट नहीं भरता वह राजनीति भ्रष्ट, पापी और नीच राजनीति है।’ अर्थात राजनीति को हम दरकिनार करके समाज के विकास या समतामूलक समाज की स्थापना की बात नहीं कर सकते हैं। क्योंकि राजनीति भी हमारे समाज का ही हिस्सा है।

🇮🇳 राजनीति में शुचिता और पारदर्शिता डॉ. लोहिया की पहली शर्त थी, लेकिन राजनीति का बदलता स्वरूप समाज की प्राथमिकता को कम कर रहा है। समाज से सीधा संवाद नहीं हो रहा है। यहाँ पर संवाद की प्रक्रिया में ओपिनियन लीडर की भूमिका अहम हो गई है, जो राजनीतिक पार्टियों के द्वारा तय किए गए मुद्दों पर केंद्रित होता दिख रहा है।

🇮🇳 जहाँ समाज की भूमिका कम हो जाती है और राजनीति धीरे-धीरे रोजी-रोटी की समस्या से दूर होने लगती है। वहीं वोट की राजनीति पर अधिक केंद्रित हो जाती है। जबकि किसी देश का उत्थान जनता की चेतना और राजनीतिक जागरूकता पर निर्भर करता है।

🇮🇳 डॉ. लोहिया समाज के अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करते थे। उन्होंने कहा कि आर्थिक गैर बराबरी जाति-पाति राक्षस हैं और अगर एक से लड़ना है तो दूसरे से भी लड़ना जरूरी है। जाति समाज में असमानता को उत्पन्न करती है। जाति प्रथा के कारण ही समाज के निम्न वर्ग के लोग शोषण का शिकार होते हैं और उन्हें उन्नति के अवसरों से दूर कर देती है।

🇮🇳 यही असमानता मानव विकास की यात्रा में बढ़ती दिख रही है। इसके लिए जाति भेदभाव को खत्म करने की आवश्यकता है और यह आर्थिक बराबरी होने पर ही खत्म हो सकती है। इसलिए समाज को बराबरी और समतामूलक बनाने के लिए इनसे छुटकारा पाना होगा। वे आजीवन समाजवादी विचारों के समरूप समानता स्थापित करने लिए संघर्षरत रहे।

🇮🇳 वह देश के उन तमाम लोगों की आवाज थे, जिनकी आवाज संसद तक नहीं पहुँचती थी। उन सभी की आवाज को उन्होंने संसद तक पहुंचाया। आज भी हमें याद है कि कैसे राम मनोहर लोहिया ने संसद में एक आम आदमी के रोज के खर्चे से हजारों गुना अधिक बताते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पर तीखा हमला किया था।

🇮🇳 उन्होंने एक आम आदमी की आमदनी की पीड़ा को प्रधानमंत्री के समक्ष रखा। उन्होंने कहा था-

जो आबादी का 27 करोड़ है, वह तीन आना प्रतिदिन पर जीवनयापन कर रहे हैं। वहीं प्रधानमंत्री के कुत्ते पर प्रतिदिन तीन रुपये का खर्च किया जाता है। जबकि प्रधानमंत्री पर प्रतिदिन 25 से 30 हजार रुपये खर्च होता है। उन्होंने संसद में जनता की समस्याओं को तर्कों के साथ रखने की एक अलग पहचान को साबित किया। 

🇮🇳 आज भी डॉ. लोहिया के विचारों से सीखने की जरूरत है कि कैसे विपक्ष की भूमिका में रहकर जनता के सवालों को पूरे जोरदार तरीके से रखा जाए। यह बातें सिर्फ लोहिया के भाषण के रूप में नहीं है, बल्कि वर्तमान राजनीतिक पार्टियों के लिए सीखने और आत्मसात करने की जरूरत है। उनके कालखंड में जितने भी विपक्षी नेता हुए, उन सब में एक नैतिक बल की दृष्टि थी, जिसका आज के विपक्षी नेताओं में अभाव दिख रहा है।

🇮🇳 वे जीवन के अंतिम वर्षों में राजनीति के अलावा साहित्य एवं कला पर युवाओं से संवाद करते रहे। उन्होंने कहा था कि ‘जिंदा कौमें पाँच साल इंतजार नहीं करतीं।’ डॉ. लोहिया जीवन के अंतिम क्षण तक कौम के बारे में सोचते रहते थे, लेकिन अब यह दिखाई नहीं देता।

🇮🇳 आज के नेता सिर्फ व सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, जिससे परिवारवाद का भी आरोप लगता रहा है। भारतीय राजनीति में डॉ. लोहिया की आज भी जरूरत है। उनका विचार और समतामूलक समाज की अवधारणा भारतीय संदर्भों में देश का भविष्य सुनिश्चित कर सकता है।

साभार : amarujala.com

🇮🇳 समतामूलक समाज की अवधारणा को आगे बढ़ाने वाले, समाजवाद के जनक, भारतीय #स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानी #राममनोहर_लोहिया जी को उनकी जयंती पर कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि !

#RamManohar_Lohia ji

🇮🇳💐🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

सूचना:  यंहा दी गई  जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की  कोई गारंटी नहीं है। सूचना के  लिए विभिन्न माध्यमों से संकलित करके लेखक के निजी विचारो  के साथ यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह  की जिम्मेदारी स्वयं निर्णय लेने वाले पाठक की ही होगी।' हम या हमारे सहयोगी  किसी भी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं है | धन्यवाद। ... 

Notice: There is no guarantee of authenticity or reliability of the information/content/calculations given here. This information has been compiled from various mediums for information and has been sent to you along with the personal views of the author. Our aim is only to provide information, readers should take it as information only. Apart from this, the responsibility of any kind will be of the reader himself who takes the decision. We or our associates are not responsible for this in any way. Thank you. 


| स्वतंत्रता सेनानी सुहासिनी गांगुली | जन्म- 3 फ़रवरी, 1909; मृत्यु- 23 मार्च, 1965





 #क्रांतिकारी_वीरांगना भारत की लड़ाई में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं ने भी कंधे से कंधा मिलाकर अपना योगदान दिया। इसमें से कई महिलाओं ने जहाँ #महात्मा_गाँधी के अहिंसा का मार्ग अपनाया तो वहीं कई महिलाओं ने #चंद्रशेखर_आजाद और #भगत_सिंह जैसे क्रांतिकारियों के मार्ग को अपनाया। ऐसे ही महान महिला स्वतंत्रता सेनानियों में #सुहासिनी गांगुली का नाम प्रमुख है जिन्होंने बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियों में अपना सक्रिय योगदान दिया ।

🇮🇳 सुहासिनी गांगुली का जन्म 3 फरवरी 1909 को तत्कालीन बंगाल के #खुलना में हुआ था।

🇮🇳 अपनी शिक्षा पूरी करने के उपरांत उन्होंने #कोलकाता में एक मूक बधिर बच्चों के स्कूल में नौकरी करना शुरू किया जहाँ पर वह क्रांतिकारियों के संपर्क में आई।

🇮🇳 उल्लेखनीय है कि उन दिनों बंगाल में ‘छात्री संघा’ नाम का एक महिला क्रांतिकारी संगठन कार्यरत था जिसकी कमान #कमला_दासगुप्ता के हाथों में थी। उल्लेखनीय है कि इसी संगठन से #प्रीति_लता_वादेदार और #बीना_दास जैसी वीरांगनायें जुड़ी हुई थी।

🇮🇳 खुलना के क्रांतिकारी #रसिक_लाल_दास और क्रांतिकारी #हेमंत_तरफदार के संपर्क में आने से सुहासिनी गांगुली क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर प्रेरित हुई और जल्द ही #युगांतर_पार्टी से जुड़ गई।

🇮🇳 सन 1930 के #चटगाँव_शस्त्रागार_कांड के उपरांत #छात्री_संघा के साथ-साथ अन्य क्रांतिकारी साथियों समेत सुहासिनी गांगुली पर भी निगरानी बढ़ गई। इसके उपरांत वह चंद्रनगर आ गई एवं क्रांतिकारी #शशिधर_आचार्य की छद्म धर्मपत्नी के तौर पर रहने लगीं।

🇮🇳 चंद्रनगर में रहते हुए सुहासिनी गांगुली ने क्रांतिकारियों को मदद करने में वही किरदार निभाया जैसा #दुर्गा_भाभी ने भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू समेत अन्य क्रांतिकारियों की मदद करने के लिए निभाया था।

🇮🇳 इन्होंने पर्दे के पीछे से क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन हेतु अपने घर को ना केवल प्रमुख स्थल बनाया बल्कि उस दौर के सभी क्रांतिकारियों को जरूरत पड़ने पर आश्रय भी प्रदान किया।

🇮🇳 वर्ष 1930 में एक दिन पुलिस के साथ हुई आमने-सामने की मुठभेड़ में #जीवन_घोषाल जहाँ बलिदान हो गए वहीं शशिधर आचार्य और सुहासिनी को गिरफ्तार करके उन्हें #हिजली डिटेंशन कैम्प में रखा गया। आगे चलकर यही हिजली डिटेंशन कैम्प खड़गपुर आईआईटी का कैम्पस बना।

🇮🇳 1938 में रिहा होने के उपरांत इन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी को ज्वाइन किया। यद्यपि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कम्युनिस्ट पार्टी के द्वारा इस आंदोलन का बहिष्कार किया गया फिर भी इन्होंने आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए क्रांतिकारियों की लगातार मदद की।

🇮🇳 प्रसिद्ध क्रांतिकारी #हेमंत_तरफदार की सहायता के कारण इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया एवं इन्हें पुनः 1945 में रिहा किया गया। रिहा होने के उपरांत वह हेमंत तरफदार द्वारा निवास कर रहे धनबाद के एक आश्रम में रहने लगी।

🇮🇳 अन्य तात्कालिक स्वतंत्रता सेनानियों के विपरीत इन्होंने राजनीति का त्याग करते हुए आजादी के बाद अपना सारा जीवन सामाजिक, आध्यात्मिक कार्यों हेतु समर्पित कर दिया।

🇮🇳 मार्च 1965 में यह एक सड़क दुर्घटना की शिकार हो गई एवं इलाज के दौरान चिकित्सीय लापरवाही से बैक्टीरियल इंफेक्शन के कारण इनकी मृत्यु 23 मार्च 1965 को हो गई।

साभार: dhyeyaias.com

🇮🇳 भारत के स्वाधीनता संघर्ष की #स्वतंत्रता सेनानी, #क्रांतिकारी #वीरांगना #सुहासिनी_गांगुली जी को उनकी पुण्यतिथि पर कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से शत् शत् नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि !

#Revolutionary  #Suhasini_Ganguly ji

🇮🇳💐🙏

🇮🇳 वन्दे मातरम् 🇮🇳

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

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Lala Ram Thakur | VICTORIA CROSS WINNER | लांस नायक लाला राम | जन्म- 20 अप्रैल, 1876, हिमाचल प्रदेश; मृत्यु- 23 मार्च, 1927

 



#भारतीयता_की_पहचान_को_कायम_रखने_वाले_नायक

लांस नायक लाला राम (जन्म- 20 अप्रैल, 1876, हिमाचल प्रदेश; मृत्यु- 23 मार्च, 1927) भारतीय थल सेना के 41वें डोगरा में लांस नाईक थे। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने मेसोपोटामिया (मौजूदा इराक) में हन्ना के युद्ध में 21 जनवरी, 1916 को बहादुरी की मिसाल कायम की, जिसके लिए उनको "विक्टोरिया क्रॉस" से सम्मानित किया गया।

🇮🇳 लांस नायक लाला राम ने एक ब्रिटिश ऑफिसर को दुश्मन के करीब जमीन पर बेसुध पाया। वह ऑफिसर दूसरी रेजिमेंट का था।

लाला राम उस ऑफिसर को एक अस्थायी शरण में ले आए, जिसे उन्होंने खुद बनाया था। उसमें वह पहले भी चार लोगों की मरहम-पट्टी कर चुके थे।

🇮🇳 जब उस अधिकारी के जख्म की मरहम-पट्टी कर दी तो उनको अपनी रेजिमेंट के एजुटेंट की आवाज सुनाई दी। एजुटेंट बुरी तरह जख्मी थे और जमीन पर पड़े थे।

लाला राम ने एजुटेंट को अकेले नहीं छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने अपने पीठ पर लादकर एजुटेंट को ले जाना चाहा, लेकिन एजुटेंट ने मना कर दिया।

🇮🇳 उसके बाद वह शेल्टर में आ गए और अपने कपड़े उतारकर जख्मी अधिकारी को गर्म रखने की कोशिश की और अंधेरा होने तक उसके साथ रहे।

🇮🇳 जब वह अधिकारी अपने शेल्टर में चला गया तो उन्होंने पहले वाले जख्मी अधिकारी को मुख्य खंदक में पहुँचाया। इसके बाद वह एक स्ट्रेचर लेकर गए और अपने एजुटेंट को वापस लाए।

🇮🇳 उन्होंने अपने अधिकारियों के लिए साहस और समर्पण की अनोखी मिसाल कायम की।

🇮🇳 लाला राम का 23 मार्च, 1927 में निधन हो गया और उनके अंतिम शब्द थे- "हमने सच्चे दिल से लड़ा।"

साभार: bharatdiscovery.org

🇮🇳 विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित; प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मेसोपोटामिया (मौजूदा इराक) में हन्ना के युद्ध में 21 जनवरी, 1916 को बहादुरी की मिसाल कायम करने वाले भारतीय थल सेना के 41वें डोगरा के सैनिक #लांस_नायक_लाला_राम जी को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि !

#Lance_Nayak_Lala_Ram ji

🇮🇳💐🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

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Brigadier Rai Singh Yadav | ब्रिगेडियर राय सिंह यादव | टाइगर ऑफ नाथू ला | 17 मार्च 1925 -23 मार्च, 2017

 


#नाथू_ला_का_बाघ

लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह यादव को भारतीय सेना में 'टाइगर ऑफ नाथू ला' के नाम से याद किया जाता है। उन्होंने संगीनों और राइफल बटों के साथ आमने-सामने की लड़ाई में आगे रहकर अपने लोगों का नेतृत्व किया। 🇮🇳

🇮🇳 राय सिंह यादव का जन्म 17 मार्च 1925 को पंजाब प्रांत (अब हरियाणा के रेवाड़ी जिले) के #गुड़गाँव जिले के #कोसली गाँव में हुआ था। उनके पिता #रायसाहब_गणपत_सिंह थे जिन्होंने 1920 के दशक में ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा की थी। राय सिंह ने अपनी सीनियर कैम्ब्रिज किंग जॉर्ज मिलिट्री स्कूल, जुलुंदुर से उत्तीर्ण की। वह 1944 में एक सिपाही के रूप में सेना में शामिल हुए। उन्हें 10 दिसंबर 1950 को 2 ग्रेनेडियर्स में नियुक्त किया गया था। उनका दिमाग विश्लेषणात्मक था और सेवा के आरंभ में ही वे सैन्य रणनीति और रणनीति में निपुण हो गए थे। उन्हें यूके के कैम्बरली में प्रतिष्ठित डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज में भाग लेने के लिए नामांकित किया गया था।   

🇮🇳 1962 में झटके के बाद, किसी भी चीनी हमले के खिलाफ भारत की उत्तरी सीमाओं की रक्षा के लिए सात पर्वतीय डिवीजनों को खड़ा किया गया था। नाथू ला डोंगक्या रेंज पर एक पहाड़ी दर्रा है जो 14,250 फीट (4,340 मीटर) की ऊंचाई पर सिक्किम और तिब्बत की चुम्बी घाटी को अलग करता है। सिक्किम के नाथू ला दर्रे पर, तैनात चीनी और भारतीय सेनाएँ लगभग 20-30 मीटर की दूरी पर तैनात थीं। क्षेत्र में छोटे पैमाने पर झड़पें अक्सर होती रहीं। लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह ने नाथू ला सीमा चौकी की सुरक्षा करने वाले 2 ग्रेनेडियर्स की कमान संभाली। 

🇮🇳 20 अगस्त 1967 को, लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह यादव को उत्तरी कंधे पर पहली चीनी घुसपैठ के बाद नाथू ला में जल शेड के साथ तार की बाड़ बनाने का आदेश दिया गया था। चीनी राजनीतिक कमिश्नर रेन रोंग, पैदल सेना की एक टुकड़ी के साथ, दर्रे के केंद्र में आये जहाँ लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह यादव अपनी कमांडो पलटन के साथ खड़े थे। रोंग ने यादव से तार बिछाना बंद करने को कहा। भारतीय सैनिकों ने रुकने से इनकार कर दिया. चीनियों ने भारतीय सैनिकों पर मशीनगनों से गोलीबारी कर जवाब दिया। दर्रे में कवर की कमी के कारण शुरुआत में भारतीय सैनिकों को भारी क्षति उठानी पड़ी। बाद में चीनियों ने भी भारतीयों पर तोपखाने से गोलियाँ चलायीं। 

🇮🇳 भारतीय सैनिकों ने अपनी ओर से तोपखाने से जवाब दिया। झड़प दिन-रात चलती रही, अगले तीन दिनों तक दोनों पक्षों ने तोपखाने से गोलाबारी की। भारतीय सैनिक चीनी सेना को 'पीटने' में कामयाब रहे। दुश्मन के गंभीर प्रतिरोध के बावजूद, यादव बाड़ लगाने का काम सफलतापूर्वक पूरा करने में कामयाब रहे। 

🇮🇳 7 सितंबर 1967 को, उन्हें उत्तरी कंधे से दक्षिण कंधे तक बाड़ का विस्तार करने का आदेश दिया गया था। चीनियों ने गोलीबारी शुरू कर दी, संगीनों और राइफल बटों का भी इस्तेमाल किया। 11 सितंबर को बाड़ को मजबूत करने का काम करते समय चीनियों ने मोर्टार और रिकॉइललेस गन से हमला कर दिया। उन्होंने अपनी यूनिट को सभी उपलब्ध हथियारों के साथ जवाबी गोलीबारी करने का आदेश दिया, और अपने लोगों को सुरक्षा में वापस लाने के लिए कवर फायर देने के लिए व्यक्तिगत रूप से एक लाइट मशीन गन (एलएमजी) से गोलीबारी की। 

🇮🇳 जब उनका खुद का बंकर क्षतिग्रस्त हो गया, तो वह खुले में आये, एक घायल सैनिक का हथियार उठाया और चीनियों पर गोलीबारी करते रहे। बाद में उन्होंने ब्राउनिंग मशीन गन का संचालन किया जब इसके ऑपरेटर की मौत हो गई। लेकिन बाद में उनके पेट में गोली लगी और वह मौके पर ही गिर पड़े. उसके सिर पर भी छर्रे से वार किया गया। कुछ समय बाद, जब उन्हें होश आया, तो उन्होंने हिलने से इनकार कर दिया और अपने गंभीर घावों की परवाह किए बिना, उन्होंने निर्देश देना जारी रखा और अपने सैनिकों को लड़ते रहने के लिए प्रोत्साहित किया। 

🇮🇳 लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह यादव को भारतीय सेना में 'टाइगर ऑफ नाथू ला' के नाम से याद किया जाता है। उन्होंने संगीनों और राइफल बटों के साथ आमने-सामने की लड़ाई में सामने से अपने लोगों का नेतृत्व किया और इस प्रकार दुश्मन के सामने विशिष्ट बहादुरी और असाधारण नेतृत्व का प्रदर्शन किया। इसके लिए उन्हें महावीर चक्र (एमवीसी) से सम्मानित किया गया।

🇮🇳 लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह (एमवीसी), सेना मुख्यालय, नई दिल्ली में सैन्य संचालन निदेशालय में जनरल स्टाफ ऑफिसर ग्रेड 1 के रूप में तैनात थे। बाद में, उन्हें ब्रिगेडियर के पद पर पदोन्नत किया गया और एक इन्फैंट्री ब्रिगेड की कमान सौंपी गई। उन्होंने प्रतिनियुक्ति पर सीमा सुरक्षा बल में महानिरीक्षक (संचालन) के रूप में भी कार्य किया। 23 मार्च, 2017 को उन्होंने अंतिम साँस ली।

साभार: oneindiaonepeople.com

🇮🇳 युद्ध क्षेत्र में विशिष्ट बहादुरी और असाधारण नेतृत्व के लिए महावीर चक्र (एमवीसी) से सम्मानित; #ब्रिगेडियर_राय_सिंह_यादव जी को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि !

#Brigadier_Rai_Singh_Yadav

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Sardar Bhagat Singh | स्वतंत्रता सेनानी एवं क्रान्तिकारी | सरदार भगत सिंह | जन्म: 28 सितम्बर 1907 , वीरगति: 23 मार्च 1931



#क्रांतिकारी_बलिदानियों_का_देश_के_लिए_स्वप्न_कब_पूरा_होगा ???

भगत सिंह (जन्म: 28 सितम्बर 1907 , वीरगति: 23 मार्च 1931) भारत के एक महान स्वतंत्रता सेनानी एवं क्रान्तिकारी थे।

28 सितंबर 1907 को लायलपुर, पश्चिमी पंजाब, भारत (वर्तमान पाकिस्तान) में एक सिख परिवार में जन्मे भगत सिंह, किशन सिंह संधू और विद्या वती के बेटे थे। सात भाई-बहनों में भगत सिंह दूसरे नंबर पर थे उनके दादा अर्जन सिंह, पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थे।

भगत सिंह ने अपनी 5वीं तक की पढाई गांव में की और उसके बाद उनके पिता किशन सिंह ने दयानंद एंग्लो वैदिक हाई स्कूल, लाहौर में उनका दाखिला करवाया। बहुत ही छोटी उम्र में भगत सिंह, #महात्मा गांधी जी के असहयोग आन्दोलन से जुड़ गए और बहुत ही बहादुरी से उन्होंने ब्रिटिश सेना को ललकारा।

महज़ 24 साल की उम्र में #ब्रिटिश सरकार ने सरदार भगत सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया था. उन पर #लाहौर षडयंत्र केस में शामिल होने का आरोप था. #भगत सिंह के साथ #राजगुरु और #सुखदेव #Bhagat_Singh, #Rajguru and #Sukhdev को भी सज़ा-ए-मौत दी गई थी

भगत सिंह जिस तस्वीर को अपनी जेब में रखते थे वह किसी बाबा की फोटो नहीं थी वो एक 19 साल के नौजवान #करतार सिंह सराभा की फोटो थी जिसे भगत सिंह अपना आदर्श, अपना गुरु मानते थे. #पंजाब के लुधियाना जिले के सराभा गांव में 24 मई, 1896 को जन्म करतार सिंह सराभा को अंग्रेजों ने महज 19 साल की उम्र में ही #फांसी दे दी थी.

सामाजिक प्रगति कुछ लोगों के अभिजात-वर्ग बनने पर नहीं बल्कि लोकतंत्र के संवर्धन पर निर्भर करती है; सार्वभौमिक भाईचारा केवल तब प्राप्त किया जा सकता है जब सामाजिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन में अवसर की एक समानता होती है। 🔴🇮🇳

जय भारत !

~ सरदार भगत सिंह की डायरी से

मानवता को समर्पित दूरदृष्टा चिंतक, देशभक्ति से ओतप्रोत माँ भारती के सच्चे सपूत अमर बलिदानी #सरदार_भगत_सिंह जी को शत् शत् नमन !

🇮🇳💐🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

सूचना:  यंहा दी गई  जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की  कोई गारंटी नहीं है। सूचना के  लिए विभिन्न माध्यमों से संकलित करके लेखक के निजी विचारो  के साथ यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह  की जिम्मेदारी स्वयं निर्णय लेने वाले पाठक की ही होगी।' हम या हमारे सहयोगी  किसी भी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं है | धन्यवाद। ... 

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Balidan diwas | बलिदान-दिवस | भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरू | 23 मार्च, 1931



#बलिदान_दिवस

सरदार भगत सिंह 🇮🇳

🇮🇳 अमर हुतात्मा #सरदार_भगतसिंह का जन्म- 27 सितंबर, 1907 को बंगा, लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में) हुआ था व 23 मार्च, 1931 को इन्हें दो अन्य साथियों सुखदेव व राजगुरू के साथ फाँसी दे दी गई। भगतसिंह का नाम भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अविस्मरणीय है। भगतसिंह देश के लिये जीये और देश ही के लिए बलिदान भी हो गए।

🇮🇳 राजगुरु 🇮🇳

🇮🇳 24 अगस्त, 1908 को पुणे ज़िले के खेड़ा गाँव (जिसका नाम अब 'राजगुरु नगर' हो गया है) में पैदा हुए अमर हुतात्मा #राजगुरु का पूरा नाम 'शिवराम हरि राजगुरु' था। आपके पिता का नाम 'श्री हरि नारायण' और माता का नाम 'पार्वती बाई' था। भगत सिंह और सुखदेव के साथ ही राजगुरु को भी 23 मार्च 1931 को फाँसी दी गई थी।

राजगुरु 'स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं उसे हासिल करके रहूँगा' का उद्घोष करने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे।

🇮🇳 सुखदेव 🇮🇳

🇮🇳 अमर हुतात्मा #सुखदेव का जन्म 15 मई, 1907, पंजाब में हुआ था। 23 मार्च, 1931 को सेंट्रल जेल, लाहौर में भगतसिंह व राजगुरू के साथ इन्हें भी फाँसी दे दी गई। सुखदेव का नाम भारत के अमर क्रांतिकारियों और बलिदानियों में गिना जाता है। आपने अल्पायु में ही देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। सुखदेव का पूरा नाम 'सुखदेव थापर' था। इनका नाम भगत सिंह और राजगुरु के साथ जोड़ा जाता है।   

🇮🇳 इन तीनों अमर बलिदानियों की तिकड़ी भारत के इतिहास में सदैव याद रखी जाएगी। तीनों देशभक्त क्रांतिकारी आपस में अच्छे मित्र थे और देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वत्र न्यौछावर कर देने वालों में से थे। 23 मार्च, 1931 को भारत के इन तीनों वीर नौजवानों को एक साथ फ़ाँसी दी गई और 23 मार्च को बलिदान-दिवस के रूप में याद किया जाता है।

सभी राष्ट्रभक्तों की ओर से अमर हुतात्माओं को कोटि-कोटि नमन !

#Sukhdev #Rajgurusardar #BhagatSingh

🇮🇳💐🙏

भारत माता की जय 🇮🇳

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

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