सनातन धर्म में लोकों की अद्भुत संरचना – स्वर्ग लोक, नरक लोक और पाताल लोक का रहस्य सनातन धर्म में ब्रह्मांड को केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं माना गया है। वेद, पुराण और उपनिषद बताते हैं कि यह सृष्टि अनेक लोकों (dimensions) में विभाजित है। इन लोकों में देवता, ऋषि, मनुष्य, असुर और अन्य दिव्य शक्तियाँ निवास करती हैं। भारतीय शास्त्रों के अनुसार कुल 14 लोक माने गए हैं — 7 ऊर्ध्व (ऊपर के) और 7 अधोलोक (नीचे के)। 🔱 14 लोकों की संरचना सनातन परंपरा के अनुसार ब्रह्मांड को 14 लोकों में विभाजित किया गया है: 🌤️ 7 ऊर्ध्व लोक (ऊपर के लोक) भूर्लोक भुवर्लोक स्वर्लोक महर्लोक जनलोक तपलोक सत्यलोक 🌑 7 अधोलोक (नीचे के लोक) अतल वितल सुतल तलातल महातल रसातल पाताल इन लोकों का वर्णन विशेष रूप से भागवत पुराण और विष्णु पुराण में मिलता है। 🌍 1️⃣ भूर्लोक (पृथ्वी लोक) यह वही लोक है जहाँ हम वर्तमान में रहते हैं। इसे कर्मभूमि कहा गया है। यहाँ जीव अपने कर्मों के आधार पर आगे के लोकों की प्राप्ति करता है। 🌤️ 2️⃣ भुवर्लोक यह पृथ्वी और स्वर्ग के बीच का क्षेत्र है। यहाँ पितृ और...
पंचकर्म चिकित्सा – आयुर्वेद की शुद्धि और संतुलन की दिव्य प्रक्रिया भारतीय परंपरा में स्वास्थ्य को केवल रोगों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के संतुलन के रूप में देखा गया है। इसी समग्र दृष्टिकोण का मूल है पंचकर्म , जो कि आयुर्वेद की एक प्रमुख और गहन चिकित्सा पद्धति है। पंचकर्म शब्द दो भागों से मिलकर बना है — ‘पंच’ अर्थात पाँच और ‘कर्म’ अर्थात क्रियाएँ। यह पाँच प्रमुख शुद्धि प्रक्रियाओं का समूह है, जो शरीर से विषाक्त तत्वों (टॉक्सिन्स) को बाहर निकालकर दोषों (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करता है। इस लेख में हम पंचकर्म की उत्पत्ति, सिद्धांत, प्रक्रियाएँ, लाभ, सावधानियाँ और आधुनिक जीवन में इसकी उपयोगिता को विस्तार से समझेंगे। आयुर्वेद में स्वास्थ्य की अवधारणा आयुर्वेद के अनुसार शरीर में तीन प्रमुख दोष होते हैं: वात – वायु और आकाश तत्व से संबंधित पित्त – अग्नि और जल तत्व से संबंधित कफ – जल और पृथ्वी तत्व से संबंधित जब ये तीनों दोष संतुलित रहते हैं, तब व्यक्ति स्वस्थ रहता है। असंतुलन होने पर रोग उत्पन्न होते हैं। पंचकर्म इन दोषों को मूल से संतुलित करने...