त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रहस्य (सनातन धर्म में सृष्टि, पालन और संहार का दिव्य संतुलन) सनातन धर्म की सबसे गूढ़ और गहन अवधारणाओं में से एक है — त्रिदेव । ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) को मिलाकर त्रिदेव कहा जाता है। ये केवल तीन देवता नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के संचालन की तीन दिव्य शक्तियाँ हैं। जहाँ ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं, वहीं विष्णु पालनकर्ता हैं, और भगवान शिव संहार एवं पुनः सृजन के आधार हैं। त्रिदेव का सिद्धांत हमें यह समझाता है कि संसार में जो कुछ भी है, वह जन्म लेता है, विकसित होता है और फिर परिवर्तन के माध्यम से पुनः सृजित होता है। यही प्रकृति का नियम है और यही सनातन धर्म का दर्शन है। त्रिदेव की उत्पत्ति पुराणों के अनुसार जब सृष्टि का आरंभ हुआ, तब परम ब्रह्म की चेतना से तीन दिव्य शक्तियाँ प्रकट हुईं। इन्हें ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहा गया। कुछ ग्रंथों में वर्णन है कि भगवान विष्णु की नाभि से कमल उत्पन्न हुआ, उस कमल से ब्रह्मा प्रकट हुए। शिव को अनादि और अनंत बताया गया है — वे समय से परे हैं। त्रिदेव की उत्पत्ति यह दर्शाती है कि सृष्टि एक दिव...
🌼 ब्रह्मा जी: सृष्टि के सृजनकर्ता और वेदों के ज्ञाता 🌼 हिंदू धर्म में ब्रह्मा जी को सृष्टि का रचयिता माना जाता है। वे त्रिमूर्ति — ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) — में प्रथम स्थान रखते हैं। जहाँ भगवान विष्णु पालनकर्ता हैं और भगवान शिव संहारकर्ता, वहीं ब्रह्मा जी ने इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना की। ब्रह्मा जी केवल सृजन के देवता ही नहीं, बल्कि ज्ञान, वेद और बुद्धि के प्रतीक भी हैं। 🔱 ब्रह्मा जी की उत्पत्ति पुराणों के अनुसार, जब संपूर्ण ब्रह्मांड जलमय था और भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन कर रहे थे, तब उनके नाभि से एक कमल प्रकट हुआ। उस कमल से चार मुखों वाले ब्रह्मा जी का जन्म हुआ। कमल से उत्पन्न होने के कारण उन्हें “कमलासंभव” भी कहा जाता है। VED 🌸 चार मुखों का महत्व ब्रह्मा जी के चार मुख हैं, जो चार दिशाओं की ओर देखते हैं। इनका प्रतीकात्मक अर्थ है: चार वेद – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चार युग – सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग चार दिशाएँ – पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण यह चार मुख ज्ञान और व्यापक दृष्टि का प्रतीक हैं। ये भी देखे...