01 नवंबर 2025

भगवान शालिग्राम | Shaligram | “शालिग्राम: पत्थर नहीं, स्वयं विष्णु का स्वरूप”



“शालिग्राम: पत्थर नहीं, स्वयं विष्णु का स्वरूप”


हिंदू धर्म में कई प्रतीक और रूप ऐसे हैं जो दिव्यता की अनुभूति कराते हैं।

इन्हीं में से एक है — शालिग्राम शिला।

यह कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु का जीवंत रूप माना जाता है। शालिग्राम की पूजा से घर में धन, शांति और समृद्धि आती है।


शालिग्राम क्या है?


शालिग्राम एक प्राकृतिक और पवित्र शिला है, जो केवल नेपाल की गंडकी नदी में पाई जाती है। यह शिला वज्राकृति (अमोनाइट जीवाश्म) होती है और इसके अंदर स्वाभाविक रूप से चक्र व शंख के चिन्ह बने होते हैं।




यह किसी मानव द्वारा बनाया हुआ नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा निर्मित दिव्य स्वरूप है।


शालिग्राम शिला का महत्व


यह भगवान विष्णु और उनके अवतारों का प्रतीक है।

जिस घर में शालिग्राम की पूजा होती है, वहाँ लक्ष्मी का निवास माना गया है।

शालिग्राम की पूजा से पितृदोष और ग्रहदोष शांत होते हैं।

“जहाँ शालिग्राम, वहाँ स्वयं लक्ष्मी।”


शालिग्राम की उत्पत्ति

भागवत पुराण के अनुसार, शालिग्राम का संबंध देवी तुलसी से जुड़ा है।

कथा इस प्रकार है:

देवी तुलसी के पतिव्रत से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने कहा—

“तुम नदी के स्वरूप में प्रवाहित होगी, और मैं शालिग्राम बनकर तुम्हारे जल में रहूँगा।”

इसीलिए तुलसी के बिना शालिग्राम की पूजा अधूरी मानी गई है।



शालिग्राम पूजा विधि 

स्नान के बाद शालिग्राम को गंगाजल या स्वच्छ जल से स्नान कराएँ

तुलसी दल, चंदन और अक्षत अर्पित करें

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः” का जाप करें

नैवेद्य में फल, पंचामृत या मौसमी प्रसाद चढ़ाएँ

शालिग्राम को सोने, चाँदी, ताँबे या पीतल की थाली में रखें


शालिग्राम की पूजा में केवल तुलसी का उपयोग होता है, फूल का नहीं।


शालिग्राम रखने के नियम


✅ घर में एक या तीन शालिग्राम रखना शुभ माना जाता है

✅ शालिग्राम को कभी बेचा नहीं जाता — दान में ही दिया जाता है


❌ शालिग्राम को बिना पूजा रखकर नहीं छोड़ना चाहिए

❌ चमड़े, शराब, माँस आदि के पास नहीं रखना चाहिए


शालिग्राम से होने वाले लाभ


घर में लक्ष्मी का स्थायी निवास

मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा

व्यवसाय और धन वृद्धि

ग्रहदोष शांति


“शालिग्राम जहाँ होता है, वहाँ कर्म फल तुरंत मिलता है।”


शालिग्राम की पूजा केवल प्रथा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव है।

यह हमें याद दिलाता है कि भगवान हर रूप में उपस्थित हैं —

चाहे वह मूरत हो, ज्योति हो या एक साधारण सा पत्थर।


शालिग्राम के प्रकार  Types of Shaligram 


विष्णु शालिग्राम Vishnu Shaligram

लक्ष्मी नारायण शालिग्राम Lakshmi Narayan Shaligram

लक्ष्मी नरसिम्हा शालिग्राम Lakshmi Narasimha Shaligram

दामोदर शालिग्राम Damodar Shaligram

कृष्ण शालिग्राम  Krishna Shaligram Stone

हिरण्यगर्भ शालिग्राम Hiranyagarbha Shaligram

शालिग्राम शिवलिंग Shaligram Shivling

शिव शालिग्राम Shiva Shaligram

वासुदेव शालिग्राम Vasudev Shaligram

नारायण शालिग्राम Narayana Shaligram

माधव शालिग्राम Madhava Shaligram

हृषिकेश शालिग्राम Hrishikesh Shaligram

लक्ष्मी नारायण सुदर्शन शालिग्राम Laxmi Narayan Sudarshan Shaligram

दामोदर शालिग्राम Damodara Shaligram

पुरूषोत्तम शालिग्राम Purushottama Shaligram

अच्युत शालिग्राम Achyuta Shaligram

हरि शालिग्राम Hari Shaligram

संकर्षण शालिग्राम Sankarshana Shaligram

प्रद्युम्न शालिग्राम Pradyumna Shaligram

गोविंद शालिग्राम Govinda Shaligram

श्रीधर शालिग्राम Shridhara Shaligram

केशव शालिग्राम Keshava Shaligram

शेषनाग शालिग्राम Shesha Naag Shaligram

जनार्दन शालिग्राम Janardana Shaligram

पद्मनाभ शालिग्राम Padmanabha Shaligram

अनिरुद्ध शालिग्राम Aniruddha Shaligram

मदुसूधन शालिग्राम Madusudhana Shaligram

जनेऊधारी शालिग्राम Janeudhari Shaligram

सूर्य शालिग्राम Suriya Shaligram

त्रिविक्रम शालिग्राम Trivikrama Shaligram

उपेन्द्र शालिग्राम Upendra Shaligram 

अदोक्षज शालिग्राम Adokshaja Shaligram

हयग्रीव शालिग्राम Hayagriva Shaligram

परेमेष्ठिन् शालिग्राम Paremeshthin Shaligram

हिरण्यगर्भ शालिग्राम Hiranyagarbha Shaligram

चतुर्भुज शालिग्राम Chaturbhuja Shaligram

गदाधर शालिग्राम Gadadhara Shaligram

रूपिनारायण शालिग्राम Rupinarayana Shaligram

त्रिविक्रम शालिग्राम Trivikrama Shaligram

श्रीधर शालिग्राम Shridhar Shaligram

पद्मनाभ शालिग्राम Padmanabha Shaligram

“शालिग्राम स्वयं विष्णु हैं, उनकी पूजा ही आत्मिक आराधना है।”


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सूचना:  यंहा दी गई  जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की  कोई गारंटी नहीं है। सूचना के  लिए विभिन्न माध्यमों से संकलित करके लेखक के निजी विचारो  के साथ यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह  की जिम्मेदारी स्वयं निर्णय लेने वाले पाठक की ही होगी।' हम या हमारे सहयोगी  किसी भी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं है | धन्यवाद। ... 

Notice: There is no guarantee of authenticity or reliability of the information/content/calculations given here. This information has been compiled from various mediums for information and has been sent to you along with the personal views of the author. Our aim is only to provide information, readers should take it as information only. Apart from this, the responsibility of any kind will be of the reader himself who takes the decision. We or our associates are not responsible for this in any way. Thank you.

वास्तु शास्त्र | Vastu Shastra | “वास्तु: घर ही नहीं, जीवन की ऊर्जा का विज्ञान”

 



वास्तु शास्त्र Vastu Shastra 


“वास्तु: घर ही नहीं, जीवन की ऊर्जा का विज्ञान”


वास्तु शास्त्र सिर्फ ईंट–पत्थर का विज्ञान नहीं, बल्कि ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित करने का प्राचीन भारतीय ज्ञान है। यह बताता है कि हमारा घर केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि विचारों, व्यवहार और सफलता को प्रभावित करने वाला ऊर्जा–केन्द्र है।

जहाँ वास्तु होता है, वहाँ सकारात्मक ऊर्जा, स्वास्थ्य, समृद्धि और शांति बसती है।



वास्तु क्या है?

वास्तु शास्त्र = वास्तु (स्थान) + शास्त्र (विज्ञान)

यह पाँच तत्वों पर आधारित है:

✅ पृथ्वी (Earth)

✅ जल (Water)

✅ अग्नि (Fire)

✅ वायु (Air)

✅ आकाश (Space)


इन तत्वों के सही संयोजन से घर में ऊर्जा प्रवाह संतुलित होता है।



घर के प्रमुख स्थान और वास्तु

स्थान दिशा (Vastu Direction) सलाह

मुख्य द्वार (Main Door) उत्तर / पूर्व घर की ऊर्जा का प्रवेश द्वार, साफ–सुथरा रखें

पूजा कक्ष उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र

शयनकक्ष (Bedroom) दक्षिण-पश्चिम स्थिरता, सुरक्षा व स्थायित्व

रसोईघर (Kitchen) दक्षिण-पूर्व यह अग्नि तत्व की दिशा है

बैठक कक्ष / Living Room उत्तर या पूर्व सुख, सौहार्द व अतिथि–सत्कार

जल व्यवस्था (Tank, Underground Water) उत्तर-पूर्व / उत्तर प्रगति और ज्ञान की ऊर्जा


वास्तु के सरल और प्रभावी उपाय

ये उपाय बिना तोड़–फोड़ और बिना खर्च के ऊर्जा सुधारने में मदद करते हैं:



⭐ मुख्य द्वार पर स्वस्तिक, ॐ या दीपक लगाएँ

⭐ घर में पर्याप्त रोशनी और हवा रखें

⭐ टूटी चीजें, पुरानी घड़ी, बंद घड़ी न रखें

⭐ रसोई में गैस–चूल्हा और पानी का स्रोत (सिंक) एक-दूसरे से दूर रखें

⭐ उत्तर दिशा में हरे पौधे शुभ माने जाते हैं


याद रखें: क्लटर (कचरा) = नकारात्मक ऊर्जा


वास्तु और ऊर्जा का प्रभाव

बहुत से लोग बताते हैं कि घर में वास्तु संतुलन होने से:


मानसिक शांति बढ़ती है

रिश्तों में सौहार्द आता है

काम में प्रगति होती है

नींद और स्वास्थ्य बेहतर होता है


वास्तु का उद्देश्य भवन सजाना नहीं, जीवन को संतुलित करना है।


वास्तु मंत्र

✅ “Positive space creates a positive life.”


वास्तु शास्त्र जीवन में संतुलन, सरलता और सकारात्मक ऊर्जा का विज्ञान है।

यदि घर अच्छा है, तो विचार अच्छे बनते हैं… और विचार–ही भाग्य बनाते हैं।


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देवउठनी एकादशी | Dev Uthani Ekadashi | “देव जागे, मांगलिक कार्यों का शुभारंभ”




हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व है, और कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी— देवउठनी एकादशी, जिसे Prabodhini Ekadashi देव प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है—सबसे पवित्र मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा (चातुर्मास) के बाद जागते हैं, और फिर से संसार के पालन में सक्रिय होते हैं।


देवउठनी एकादशी क्या है?


आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु “शयन” करते हैं, और कार्तिक शुक्ल एकादशी को “उठते” हैं।


यह दिन भगवान विष्णु के जागरण का प्रतीक है

और माना जाता है कि इस दिन से सारे शुभ एवं मांगलिक कार्य जैसे—विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, नए काम की शुरुआत—फिर से शुरू किए जा सकते हैं।


शुभ मुहूर्त (Dev Uthani Ekadashi 2025)

वैदिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 1 नवंबर 2025  शनिवार को सुबह 9 बजकर 12 मिनट से प्रारंभ होकर 2 नवंबर 2025 रविवार को शाम 7 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगी।देवउठनी एकादशी की कथा


कथा के अनुसार, भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले गए, और इस अवधि में

धरती पर विवाह, यज्ञ, गृहप्रवेश आदि शुभ कार्य रोक दिए जाते हैं।


देव उठनी के दिन देवी तुलसी और भगवान विष्णु का प्रतीक विवाह किया जाता है, जिसे तुलसी–विवाह कहा जाता है।

कहते हैं


जहाँ तुलसी होती है, वहाँ स्वयं श्रीहरि का वास होता है।



देवउठनी एकादशी की पूजा विधि

1. सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

2. भगवान विष्णु और तुलसी के पौधे की पूजा करें।

3. तुलसी विवाह का आयोजन करें (रंगोली, दीपक, फल, मिष्ठान्न रखें)।

4. "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः" का जाप करें।

5. व्रत रखने वाले शाम को फलाहार करते हैं।


इस दिन दीपदान, तुलसी पूजा और गंगा स्नान का विशेष महत्व है।


तुलसी विवाह का महत्व


तुलसी विवाह के पीछे संदेश है 

“जहाँ पवित्रता और भक्ति है, वहीं विष्णु का निवास है।”

"Where there is purity and devotion, there resides Vishnu."

तुलसी विवाह वस्तुतः शुभता और नए आरंभ का प्रतीक है।


देवउठनी एकादशी का संदेश


उत्सव Celebration

नई शुरुआत New Beginnings

शुभ कार्यों का आरंभ Start of Auspicious Work

आध्यात्मिक शुद्धि Spiritual Purification


यह दिन हमें बताता है कि हर अंत एक नई शुरुआत लेकर आता है।

देवउठनी एकादशी केवल पूजा नहीं, बल्कि नए अध्याय के आरंभ का संदेश है।



जब भगवान जागते हैं, तो भाग्य भी जागता है।

🌿 “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः” 🌿 “Om Namo Bhagwate Vasudevay Namah”


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31 अक्टूबर 2025

कल्पवृक्ष | Kalpavriksha | इच्छा पूर्ण करने वाला दिव्य वृक्ष | The Divine Wish-Fulfilling Tree



 🌿  “कल्पवृक्ष – जहाँ  ✨  इच्छाएँ पूर्ण होती हैं, मन शांत होता है” 🔱 

“Kalpavriksha – Where desires are fulfilled, the mind is at peace”

हम अक्सर सुनते हैं — "कल्पवृक्ष के नीचे बैठो, तुम्हारी मनोकामनाएँ पूरी होंगी।"

लेकिन क्या वास्तव में कोई ऐसा वृक्ष है?


हिंदू धर्म के ग्रंथों में कल्पवृक्ष या कल्पतरु को इच्छापूर्ति करने वाला दिव्य वृक्ष माना गया है। इसका उल्लेख समुद्र मंथन में मिलता है, जहाँ यह रत्नों में से एक के रूप में प्रकट हुआ था।


🌿  कल्पवृक्ष क्या है?

कल्पवृक्ष एक ऐसा वृक्ष है जो केवल भौतिक वस्तुएँ ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पूर्णता भी देता है।


"कल्पतरु वह है जो मनुष्य की ‘इच्छा’ को ‘वास्तविकता’ में बदल दे।"


लेकिन यहाँ "इच्छा" का अर्थ केवल भौतिक लाभ नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष, शांति और आध्यात्मिक उन्नति है।


कल्पवृक्ष

समुद्र मंथन के दौरान जो 14 रत्न निकले, उनमें से एक था कल्पवृक्ष।

इस वृक्ष को देवताओं   🔱 के लोक स्वर्ग में स्थापित किया गया।

कल्पवृक्ष की अवधारणा जैन धर्म और बौद्ध धर्म में भी पाई जाती है। 




स्कंद पुराण और भागवत पुराण में वर्णन मिलता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठने से —

"मन की शंकाएँ दूर होती हैं " "Doubts in the mind are dispelled"

"विचार निर्मल होते हैं  " "Thoughts become pure"

"इच्छाएँ सहज रूप से पूर्ण होती हैं " "Wishes are fulfilled effortlessly"


कल्पवृक्ष को “देवताओं का इच्छा वृक्ष”  ✨  "Wish Tree of the Gods." कहा गया है।


वास्तविक जीवन में कल्पवृक्ष

अध्यात्म में कहा गया है:

"जहाँ मन शांत हो और विचार साफ़ हों, वही कल्पवृक्ष है।"

"Where the mind is calm and thoughts are clear, that is the Kalpavriksha."


कई स्थानों पर विशिष्ट पेड़ों को कल्पवृक्ष 🌿  माना जाता है, जैसे


द्वारका / सोमनाथ                     बड़ (बरगद) वृक्ष को कल्पवृक्ष 

राधा–कृष्ण की लीला स्थली (वृंदावन) कल्पवृक्ष दर्शन

दक्षिण भारत के मंदिर परिसर    कल्पतरु

कल्पवृक्ष को  कल्पतरु, कल्पद्रुम, कल्पलता और सुरतरु जैसे नामों से भी जाना जाता है।



कल्पवृक्ष का दार्शनिक अर्थ

कल्पवृक्ष का वास्तविक सार बहुत गहरा है:

कल्प = कल्पना / इच्छा

वृक्ष = वास्तविकता / साकार


यानी जो इच्छा को साकार कर दे — वही कल्पवृक्ष है।

कल्पवृक्ष यह सिखाता है कि

जिस मन में श्रद्धा और विश्वास है, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं।

"Nothing is impossible for a mind that has faith and belief."


कल्पवृक्ष और मनोकामना सिद्धि

जब हम किसी वृक्ष के नीचे शांत बैठते हैं, तो मन स्थिर होता है।

स्थिर मन में व्यक्ति अपनी सच्ची इच्छा पहचानता है और उसके लिए स्पष्ट दिशा मिलती है।

इसलिए कहा गया 

"कल्पवृक्ष केवल इच्छाएँ पूरी नहीं करता, इच्छाएँ स्पष्ट करता है।"

"Kalpavriksha doesn't just fulfill wishes, it clarifies them."


ध्यान और कल्पवृक्ष साधना

कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर सरल ध्यान किया जा सकता है:

आँखें बंद करें , गहरी साँसें लें , अपनी मनोकामना स्पष्ट रूप से सोचें


वृक्ष को उस इच्छा को साकार करते हुए कल्पना करें

यह अभ्यास मन को शांत करता है, निर्णय क्षमता बढ़ाता है और सकारात्मक ऊर्जा देता है।


कल्पवृक्ष केवल 🔱 पौराणिक कथा नहीं, बल्कि जीवन का रूपक है।

जहाँ मन शांत हो और भावनाएँ शुद्ध — वही कल्पवृक्ष है।


🌿  कल्पवृक्ष हमें सिखाता है: ✨ 

"यदि इच्छा पवित्र है " "If the desire is pure"

"मन में विश्वास है " "There is faith in the mind"

और "प्रयास निरंतर है " And "The effort is continuous"

तो इच्छा अवश्य फलित होती है। The wish will surely come true.

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काशी – मणिकर्णिका घाट | जहाँ मृत्यु नहीं, मुक्ति मिलती है | Kashi – Manikarnika Ghat



 

 “मणिकर्णिका – जहाँ मृत्यु नहीं, मुक्ति मिलती है”

“Manikarnika – Where there is no death, but liberation”

भूमिका


वाराणसी—या काशी—के नाम मात्र से ही एक दिव्यता का अनुभव होता है। यह वह भूमि है जहाँ समय थम जाता है, और जीवन अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई देता है। काशी में गंगा नदी के किनारे स्थित मणिकर्णिका घाट को संसार का सबसे पवित्र श्मशान माना जाता है। यहाँ मृत्यु एक अंत नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार है।


मणिकर्णिका घाट का महत्व


मणिकर्णिका घाट काशी के सबसे प्राचीन एवं प्रमुख घाटों में से एक है। मान्यता है कि यहाँ शवदाह (अंत्येष्टि) निरंतर चलता है—24 घंटे, वर्ष के 365 दिन।


काशी एकमात्र स्थान है जहाँ मृत्यु का भय नहीं, बल्कि मुक्ति की आशा दिखाई देती है।


हिंदू मान्यता के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर होता है, तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है—यानी जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति।


शिव और देवी पार्वती की कथा


किवदंती के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव के साथ स्नान करते समय अपनी मणि (कर्ण की बाली) यहाँ खो दी। तभी से इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा।


एक अन्य मान्यता के अनुसार—


जब भगवान विष्णु ने इस स्थान पर तप किया, तो भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए उन्होंने भूमि एवं ब्रह्मांड का विशाल चक्र बनाया। उसी चक्र की एक शिला आज भी घाट पर विद्यमान है।


यह स्थान अपने भीतर हजारों वर्षों की आध्यात्मिक ऊर्जा समेटे हुए है।


मणिकर्णिका घाट की विशेषताएँ


अद्भुत निरंतरता यहाँ चिता की आग कभी नहीं बुझती — अग्नि एक निरंतर यज्ञ है।

मोक्ष का द्वार माना जाता है कि यहाँ अंतिम संस्कार होने पर आत्मा मुक्त हो जाती है।

शव साधु व डोम राजा 'डोम राजा' यहाँ अग्नि की परंपरा के संरक्षक हैं।

शांति + अराजकता का संगम

जलती चिताएँ, 

गंगा का प्रवाह, शिव मंत्र — एक अनोखा अनुभव।

मणिकर्णिका – जीवन और मृत्यु का दर्शन


यहाँ खड़ा होकर यह समझ में आता है—


जीवन क्षणभंगुर है  Life is fleeting


अहंकार व्यर्थ है  Ego is futile


अंत में सब कुछ गंगा में विलीन हो जाता है  In the end, everything dissolves in the Ganges.


काशी सिखाती है— मृत्यु अंत नहीं, एक नई शुरुआत है।

"Death is not the end, but a new beginning."


मणिकर्णिका घाट का अनुभव


यहाँ आने वाला हर व्यक्ति बदल जाता है।


जहाँ एक ओर जीवन का अंतिम अध्याय लिखा जा रहा होता है, वहीं दूसरी ओर घाट के ऊपर गलियों में जीवन हँसता-मुस्कुराता दिखाई देता है।


लोग कहते हैं—


“काशी में मौत मरती है।” "Death dies in Kashi."


गंगा किनारे नाव से घाट का दृश्य अद्भुत लगता है।

शाम के समय निकटवर्ती घाटों पर गंगा आरती देखें।


मणिकर्णिका घाट केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक विचार है—


"जीवन अनिश्चित है, और मृत्यु निश्चित।"

"Life is uncertain, and death is certain."


काशी कहती है—

“जब तक मैं हूँ, मृत्यु भी तुम्हें कुछ नहीं कर सकती।”

“As long as I am here, even death cannot harm you.”

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समुद्र मंथन Samudra Manthan


 

समुद्र मंथन  Samudra Manthan

समुद्र मंथन हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक प्रसंगों में से एक है, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण और महाभारत आदि ग्रंथों में मिलता है। यह प्रसंग देवताओं (सुरों) और दानवों (असुरों) के बीच हुए सहयोग, संघर्ष और दिव्य वरदानों की प्राप्ति की कथा है।


कथा संक्षेप में

इंद्र के अभिमान के कारण देवताओं को राजा बलि से हार का सामना करना पड़ा और उनकी शक्तियाँ कमज़ोर हो गईं। तब भगवान विष्णु ने देवताओं को सलाह दी कि—

“असुरों के साथ मिलकर क्षीर सागर का मंथन करो। उसमें छुपे अमृत को प्राप्त करो।”


देवताओं ने असुरों के साथ समझौता किया कि अमृत मिलने पर सबको समान भाग मिलेगा।


समुद्र मंथन की प्रक्रिया

मंथन-दंड (रस्सी) राजा सर्प वासुकी

मंथन का धुरी (आधार) पर्वत मंदराचल

आधार (कूर्म अवतार) भगवान विष्णु ने कच्छप (कूर्म) रूप धारण कर पहाड़ को अपनी पीठ पर स्थिर किया

देवताओं और असुरों ने मिलकर मंथन किया


मंथन से निकले 14 रत्न (Ratnas)

समुद्र मंथन में कुल 14 मुख्य रत्न निकले —

विष (हलाहल) — शिव ने पीकर नीलकंठ नाम पाया

कामधेनु — दिव्य गाय

उच्चैःश्रवा — सफेद घोड़ा

ऐरावत — इंद्र का हाथी

कौस्तुभ मणि — विष्णु के कंठ पर सुशोभित

कल्पवृक्ष — इच्छा पूर्ण करने वाला वृक्ष

अप्सराएँ

वरुण का धन

लक्ष्मी जी — भगवान विष्णु के साथ विवाह

शंख

धन्वंतरि — अमृत कलश लेकर प्रकट हुए

अमृत — अमरत्व देने वाला

(सूची विभिन्न पुराणों में थोड़ी अलग हो सकती है)


अमृत लेकर धन्वंतरि जब प्रकट हुए तो देवताओं और असुरों में  संग्राम शुरू हो गया। तभी भगवान विष्णु मोहिनी रूप में आए और अपनी मोहिनी माया से अमृत देवताओं को पिलाया।

इस प्रकार देवताओं को फिर से शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त हुआ तथा असुर पराजित हुए।


समुद्र मंथन का संदेश


बड़े लक्ष्य के लिए सहयोग आवश्यक है, चाहे वह विरोधी के साथ ही क्यों न हो।

सफलता पाने के लिए श्रम और धैर्य जरूरी है।

पहले विष (कठिनाइयाँ) आता है, फिर अमृत (फल) मिलता है।

“समुद्र मंथन केवल पुराणिक कथा नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है —

विपरीत परिस्थितियाँ ही हमारे भीतर छुपे ‘रत्न’ बाहर लाती हैं।”


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सूचना:  यंहा दी गई  जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की  कोई गारंटी नहीं है। सूचना के  लिए विभिन्न माध्यमों से संकलित करके लेखक के निजी विचारो  के साथ यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह  की जिम्मेदारी स्वयं निर्णय लेने वाले पाठक की ही होगी।' हम या हमारे सहयोगी  किसी भी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं है | धन्यवाद। ... 

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24 अक्टूबर 2025

तुलसी विवाह | Tulsi Vivah | भक्ति, समर्पण और शुभ आरंभ का प्रतीक पर्व



🌿 तुलसी विवाह: भक्ति, समर्पण और शुभ आरंभ का प्रतीक पर्व 🌿

🌿 Tulsi Vivah: A Festival Symbolizing Devotion, Dedication, and Auspicious Beginnings 🌿


तुलसी विवाह एक ऐसा पवित्र पर्व है जो देवउठनी एकादशी (प्रभोधिनी एकादशी) के बाद मनाया जाता है।

यह वह क्षण होता है जब भगवान विष्णु चार महीने के योग निद्रा काल के बाद जागते हैं,

और उनके जागरण के साथ ही सभी शुभ कार्यों की पुनः शुरुआत होती है।


तुलसी विवाह को धरती पर भगवान विष्णु और देवी तुलसी के विवाह के रूप में मनाया जाता है।

यह पर्व भक्ति, श्रद्धा और दिव्य प्रेम का सुंदर संगम है।



🌸 पौराणिक कथा


पुराणों में वर्णन है कि तुलसी देवी (Vrinda) एक अत्यंत पतिव्रता स्त्री थीं।

उनके पति जालंधर, एक असुर, भगवान शिव से युद्ध में अजेय थे,

क्योंकि उन्हें अपनी पत्नी वृंदा की पतिव्रता शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त था।


भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए वृंदा की परीक्षा ली,

और उसके परिणामस्वरूप जालंधर का वध हुआ।

जब वृंदा को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि

वह पत्थर के रूप में (शालिग्राम) पूजे जाएँगे,

और वह स्वयं तुलसी के पौधे के रूप में पृथ्वी पर रहेंगी।


बाद में भगवान विष्णु ने तुलसी से विवाह करके उन्हें सम्मान दिया।

इस प्रकार तुलसी विवाह की परंपरा आरंभ हुई —

जो हर वर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा के बीच संपन्न की जाती है।


“तुलसी विवाह हमें सिखाता है कि

भक्ति, समर्पण और प्रेम के बिना जीवन अधूरा है।”


🪔 व्रत और पूजन विधि


तुलसी विवाह के दिन घरों में या मंदिरों में

तुलसी का मंडप सजाया जाता है, ठीक वैसे जैसे किसी कन्या का विवाह होता है।

शालिग्राम (भगवान विष्णु का रूप) को वर के रूप में स्थापित किया जाता है।


विवाह विधि में शामिल होते हैं —


हल्दी, सिंदूर, चूड़ी और वस्त्र तुलसी माता को अर्पित करना


तुलसी जी के चारों ओर दीप जलाना


शंखनाद और मंगल गीत गाना


सप्तपदी और आरती के साथ विवाह संस्कार पूर्ण करना


पूजन के बाद सभी भक्त प्रसाद और तुलसी दल ग्रहण करते हैं।




🌼 आध्यात्मिक महत्व


तुलसी विवाह केवल पूजा नहीं, बल्कि प्रकृति और ईश्वर के मिलन का उत्सव है।

यह हमें यह सिखाता है कि श्रद्धा और सरलता में ही सच्चा सौंदर्य है।

तुलसी का पौधा न केवल धार्मिक दृष्टि से पवित्र है,

बल्कि यह स्वास्थ्य, शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी है।


“जहाँ तुलसी का वास, वहाँ सुख और विश्वास।”


💫 आधुनिक सन्दर्भ में तुलसी विवाह


आज के समय में तुलसी विवाह का महत्व और भी बढ़ गया है।

जब जीवन में कृत्रिमता बढ़ रही है,

यह पर्व हमें प्रकृति से जुड़ने और जीवन की सरलता को अपनाने की प्रेरणा देता है।


यह सामाजिक और पारिवारिक एकता का भी प्रतीक है —

जहाँ सब मिलकर प्रेम, संगीत और भक्ति से भरपूर वातावरण में

एक दिव्य विवाह का साक्षी बनते हैं।


🌺 उपसंहार


तुलसी विवाह का पर्व

धार्मिक श्रद्धा और सांस्कृतिक सौंदर्य का अद्भुत उदाहरण है।

यह विवाह हमें याद दिलाता है कि प्रेम, भक्ति और विश्वास

हर रिश्ते की आत्मा हैं।


“तुलसी के पत्ते में छिपा है अमृत,

और उसके विवाह में झलकता है सच्चा समर्पण।”


🌿 शुभ तुलसी विवाह की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌿

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