10 मार्च 2024

Priyanka Goswami | प्रियंका गोस्वामी | महिला एथलीट | Female Athlete | जन्म- 10 मार्च, 1996

 



प्रियंका गोस्वामी (जन्म- 10 मार्च, 1996) भारतीय #महिला_एथलीट  #female_ athleteहैं। उन्होंने बर्मिघम, इंग्लैंड में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स, 2022 में कमाल का प्रदर्शन करते हुए महिलाओं की 10 हजार मीटर रेस वॉक (पैदल चाल) में भारत के लिये रजत पदक जीता है। इस खिलाड़ी ने अपना सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए देश को पदक दिलाया। प्रियंका गोस्वामी ने 43:38.82 समय में रेस पूरी की। इस जीत के साथ ही प्रियंका गोस्वामी ने इतिहास रच दिया है। वह पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं, जिसने कॉमनवेल्थ गेम्स में पैदल चाल में पदक हासिल किया है। प्रियंका गोस्वामी ने टोक्यो ओलिंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था, लेकिन तब वह 17वें स्थान पर रही थीं।

🇮🇳 #प्रियंका गोस्वामी भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं। वह मूल रूप से #मेरठ, #उत्तर_प्रदेश की रहने वाली हैं। उन्होंने 20 किलोमीटर वॉक रेस में देश के लिए कई पदक जीते हैं। उन्होंने 2021 में टोक्यो ओलिंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था। प्रियंका गोस्वामी के पिता #मदनपाल_गोस्वामी यूपी रोडवेज में कंडक्टर की नौकरी करते थे, पर किसी कारण से उनकी नौकरी चली गई। जिसके बाद घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई।

🇮🇳 प्रियंका गोस्वामी ने मेरठ के गर्ल्स स्कूल और बीके माहेश्वरी से स्कूली शिक्षा पूरी की। बीए की पढ़ाई पटियाला में की। इस दौरान पिता टैक्सी चलाकर, आटा चक्की और छोटे-मोटे कामकर जैसे-तैसे चार से पाँच हजार रुपये भेजते थे।

🇮🇳 प्रियंका गोस्वामी ने कॉमनवेल्थ गेम्स, 2022 की 10000 मीटर पैदल चाल स्पर्धा में रजत पदक जीता। उन्होंने अपना निजी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और इस लंबी दूरी को 49 मिनट 38 सेकंड में पूरा किया। इसी के साथ उन्होंने #मुरली_श्रीशंकर (लम्बी कूद में रजत) और #तेजस्विन_शंकर (ऊँची कूद में कांस्य) की लिस्ट में अपना नाम शामिल करा लिया, जिन्होंने इन खेलों की ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धाओं में पदक जीते।

🇮🇳 टोक्यो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकीं प्रियंका गोस्वामी ने वॉक के पहले चरण में बहुत तेजी से बढ़त बना ली और खुद को 4000 मीटर (4 कि.मी.) के निशान के बाद पहले स्थान पर बनाए रखा। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया की जेमिमा मोंटाग और केन्या की एमिली वामुसी एनजी से वह पीछे रह गईं। 8 कि.मी. के बाद प्रियंका गोस्वामी तीसरे स्थान पर खिसक गई थीं, लेकिन अंतिम मिनट में 2 कि.मी. की दूरी तय करने के बाद भारतीय एथलीट को फायदा हुआ।

🇮🇳 #जेमिमा_मोंटाग ने 42:38 का समय लेकर स्वर्ण पदक जीता, जबकि प्रियंका गोस्वामी दूसरे स्थान पर रहीं। प्रतियोगिता में शामिल अन्य भारतीय #भावना_जाट 8वें स्थान पर रहीं। इसके साथ ही प्रियंका गोस्वामी कॉमनवेल्थ गेम्स की रेस-वॉक स्पर्धा में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गई हैं। वह कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतने वाली दूसरी रेसवॉकर भी हैं। उनसे पहले #हरमिंदर_सिंह ने 2010 खेलों में 20 मीटर रेसवॉक में कांस्य पदक जीता था।

🇮🇳 वर्ष 2007 में प्रियंका गोस्वामी ने जिमनास्टिक में भाग लेना शुरू कर दिया था। उनके माता-पिता और शिक्षकों ने उनका काफी सपोर्ट किया।

🇮🇳 जिमनास्टिक की ट्रेनिंग के लिए प्रियंका को राज्य सरकार द्वारा संचालित छात्रावास लखनऊ भेजा जा रहा था लेकिन उन्होंने मेरठ के ही स्टेडियम में प्रशिक्षण प्राप्त करने का फैसला लिया। कुछ समय तक जिमनास्टिक की ट्रेनिंग लेने के बाद जिमनास्टिक से उनकी रूचि खत्म हो गई और उन्होंने मेरठ छात्रावास छोड़ दिया।

🇮🇳 उन्होंने खेलों से 3-4 साल का ब्रेक लिया। हालांकि उन्होंने अपना साहस सँभाला और स्टेडियम में दोबारा से लौटने का फैसला किया। लगातार दो महीने तक कोच से कठोर शारीरिक प्रशिक्षण प्राप्त किया।

🇮🇳 पटियाला से ग्रेजुएशन करने के बाद प्रियंका गोस्वामी को बेंगलूरू साईं सेंटर में निःशुल्क प्रशिक्षण मिलना शुरू हुआ।

🇮🇳 प्रियंका गोस्वामी ने रेस के शुरुआती दिनों में 800 और 1500 मीटर रेस प्रतियोगिता में भाग लिया लेकिन इन प्रतियोगिताओं में सफल नहीं हुई। जिसके बाद उन्होंने वर्ष 2011 में जिला स्तर के रेस प्रतियोगिता में भाग लिया और तीसरा स्थान प्राप्त किया। इस प्रतियोगिता में तीसरा स्थान प्राप्त करने पर उन्हें इनाम स्वरूप स्कूल बैग भेंट किया गया।

🇮🇳 वर्ष 2011 में पहला पदक हासिल करने के बाद प्रियंका ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक रेस प्रतियोगिताओं में भाग लिया।

🇮🇳 वर्ष 2015 में उन्होंने तिरुअनंतपुरम में आयोजित नेशनल चैंपियनशिप रेस प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता।

🇮🇳 वर्ष 2017 में दिल्ली में आयोजित नेशनल रेस वॉकिंग चैंपियनशिप में करतब दिखाते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

🇮🇳 वर्ष 2018 में स्पोर्ट कोटा के माध्यम से रेलवे विभाग में क्लर्क का पद हासिल किया।

🇮🇳 13 फरवरी, 2021 को उन्होंने रांची में 8वीं ओपन नेशनल और इंटरनेशनल रेस वॉकिंग चैंपियनशिप में राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया।

🇮🇳 नेशनल और इंटरनेशनल दौड़ जीतने के बाद प्रियंका गोस्वामी ने टोक्यो ओलंपिक, 2020 और अमेरिका के ओरेगन में होने वाले विश्व एथलेटिक्स चैम्पियनशिप के लिए क्वालीफाई किया।

🇮🇳 प्रियंका गोस्वामी ने जूनियर, सीनियर और नेशनल लेवल पर अब तक 60 पदक भारत के नाम किये हैं, जिसमें से दो रजत पदक राष्ट्रीय स्तर पर और एक स्वर्ण पदक अखिल भारतीय रेलवे प्रतियोगिता स्तर पर प्राप्त किया है। इसके अलावा उन्होंने इटली में आयोजित वर्ल्ड वॉक चैंपियनशिप और जापान में आयोजित एशियन वॉक चैंपियनशिप में भी भाग लिया।

साभार: bharatdiscovery.org

🇮🇳 बर्मिघम, इंग्लैंड में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स, 2022 में रजत पदक जीतकर इस खेल में पहली पदक विजेता बनी भारतीय महिला #एथलीट #रेसवॉकर (पैदल चालक) #प्रियंका_गोस्वामी जी को जन्मदिवस की वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर ढेरों बधाई एवं शुभकामनाऍं !

🇮🇳🌹🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 



सूचना:  यंहा दी गई  जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की  कोई गारंटी नहीं है। सूचना के  लिए विभिन्न माध्यमों से संकलित करके लेखक के निजी विचारो  के साथ यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह  की जिम्मेदारी स्वयं निर्णय लेने वाले पाठक की ही होगी।' हम या हमारे सहयोगी  किसी भी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं है | धन्यवाद। ... 

Notice: There is no guarantee of authenticity or reliability of the information/content/calculations given here. This information has been compiled from various mediums for information and has been sent to you along with the personal views of the author. Our aim is only to provide information, readers should take it as information only. Apart from this, the responsibility of any kind will be of the reader himself who takes the decision. We or our associates are not responsible for this in any way. Thank you. 

Rifleman Jaswant Singh, awarded Mahavir Chakra in the India-China war of 1962, Sela and Noora | 1962 के भारत-चीन युद्ध में महावीर चक्र से सम्मानित राइफलमैन जसवंत सिंह, सेला और नूरा




🇮🇳 1962 के भारत-चीन युद्ध में #महावीर_चक्र से सम्मानित #राइफलमैन_जसवंत_सिंह ने #सेला और #नूरा  #Rifleman_Jaswant_Singh, #awarded #Mahavir_Chakra #India_China_war_1962, #Sela #Nooraके साथ चीनी सेना के साथ 72 घंटों तक बहादुरी से लड़ाई लड़ी और 300 से अधिक पीएलए सैनिकों को मार डाला।

🇮🇳#Jaswant_Singh_Rawat single-handedly had held off over 300 #Chinese_soldiers for 72 hours in the icy heights of #Arunachal_Pradesh with just one machine gun during the #1962 war before laying down his life. He was posthumously awarded the #Maha_Vir_Chakra

🇮🇳 मुझे पहाड़ों की यात्रा करना बहुत पसंद है. मेरे लिए पहाड़ों में सवारी करना एक बहुत ही प्रभावी उपचार तंत्र है। खूबसूरत प्राकृतिक खजानों के साथ-साथ इन पहाड़ों के साथ कुछ दिलचस्प कहानियाँ/लोककथाएँ भी जुड़ी हुई हैं। 

🇮🇳 एक मोटरसाइकिल चालक के रूप में #अरुणाचल_प्रदेश  #Arunachal_Pradesh ने मुझे हमेशा उत्साहित किया है और इस जनवरी में मैं लामाओं की इस भूमि में रहने के लिए भाग्यशाली रहा। शून्य से नीचे के तापमान में शक्तिशाली सेला दर्रे को पार करना एक रोमांचकारी अनुभव था। 

🇮🇳 #वेस्ट_कामेंग की मेरी यात्रा के दौरान, एक दिलचस्प कहानी सामने आई। जो साझा करने लायक है. 

🇮🇳 #सेला_दर्रा #तवांग को #दिरांग से जोड़ता है और तवांग की ओर आगे बढ़ने पर #नूरा_पोस्ट नामक एक सेना चौकी पड़ती है, जिसके बाद "#जसवंत_गढ़ नामक स्थान आता है। सेला, नूरा और जसवन्त नाम वास्तव में एक कहानी के वास्तविक पात्र हैं।

एसएसबी कैंप, तवांग में एक मूर्ति हमारे बहादुर भारतीय सैनिकों की वीरता का वर्णन करती है।


🇮🇳 यह 1962 का भारत-चीन युद्ध था। चौथी गढ़वाल राइफल्स के एक सैनिक राइफलमैन जसवन्त सिंह रावत (एमवीसी) तत्कालीन उत्तर पूर्वी सीमांत एजेंसी (एनईएफए) अरुणाचल में तैनात थे। चीन की पीएलए (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) को #नूरानांग की लड़ाई के दौरान भारतीय सेना द्वारा घुसपैठ के लिए दो बार हार मिली । अपनी तीसरी घुसपैठ के दौरान, चीनी जवान जसवन्त सिंह की पोस्ट (सेला पास से 21 किमी दूर) पर एमएमजी का उपयोग करके गोलीबारी कर रहे थे और लेकिन उन्होंने दो और राइफलमैन (#त्रिलोकी_सिंह और #गोपाल_गुसाई) के साथ पीएलए को कड़ी टक्कर दी। चीनियों की भारी गोलाबारी को देखते हुए उनके आदेश से उन्हें पोस्ट खाली करने का निर्देश दिया गया। स्थिति को समझते हुए और पद के महत्व को जानते हुए, उन्होंने अपने साथी राइफलमैन के साथ अपनी आखिरी साँस तक लड़ने का फैसला किया।

🇮🇳 पोस्ट पर जसवन्त सिंह की तैनाती के दौरान सेला नामक एक स्थानीय लड़की उनकी पोस्ट पार कर जाती थी। यहीं से जसवन्त सिंह और सेला का प्रेम प्रसंग शुरू हुआ। विभिन्न लोककथाओं में उनके रिश्ते के बारे में अलग-अलग आख्यान हैं। कुछ लोग कहते हैं कि उनका लिव इन रिलेशन शिप था। कुछ लोग कहते हैं कि जसवन्त सिंह के सेला और नूरा (सेला की बहन) दोनों के साथ संबंध थे और वे दोनों जसवन्त सिंह के साथ लिव इन में रहती थी। 

🇮🇳 नवंबर 1962 में, जसवन्त सिंह के दोनों साथी राइफलमैन शहीद हो गये। लेकिन वह अपना हौसला दिखाते रहे और विशाल पीएलए को अकेले ही ढेर कर दिया। वह अपनी लोकेशन बदलता रहा और अलग-अलग एंगल से फायरिंग करता रहा. पीएलए को यह भ्रम था कि सैनिकों का एक बड़ा समूह उनके खिलाफ गोलीबारी कर रहा है। 

🇮🇳 उनके वन मैन आर्मी एक्ट के दौरान, सेला और नूरा ने उन्हें भोजन और राशन देने के साथ-साथ चीनी सेना पर भी गोलीबारी की। एक और कहानी यह भी है कि सेला और नूरा के पिता की जसवंत सिंह से दुश्मनी हो गई थी और उन्होंने उनकी पोस्ट की जानकारी पीएलए को लीक कर दी थी। 

🇮🇳 इस लड़ाई के दौरान जसवन्त सिंह और सेला शहीद हो गए और नूरा को पीएलए द्वारा पकड़ लिया गया और चीन ले जाया गया और वह कभी वापस नहीं आई। 

🇮🇳 कुछ लोगों का मानना ​​है कि सेला के पिता जसवन्त सिंह के विश्वासघात के कारण मैत्रेड और सेला ने पहाड़ की चोटी से कूदकर आत्महत्या कर ली। 

🇮🇳 राइफलमैन जसवंत सिंह ने सेला और नूरा के साथ 72 घंटों तक बहादुरी से लड़ाई लड़ी और 300 से अधिक पीएलए #PLA सैनिकों को मार डाला। यह उनकी वीरता के कारण ही था कि भारतीय सेना पीएलए पर नियंत्रण रखने में कामयाब रही जो बैसाखी पोस्ट की ओर आगे बढ़ रही थी। 

स्टेन मशीन गन एमके-वी (नूरानंग की लड़ाई)।


🇮🇳 उनके वीरतापूर्ण कार्य के लिए, राइफलमैन जसवन्त सिंह रावत को दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान, #महावीर_चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया । उनकी यूनिट (चौथी गढ़वाल राइफल्स) को "बैटल ऑनर नूरानांग" से सम्मानित किया गया था । 

बाएँ-जसवंत सिंह रावत का स्मारक। दाएं-जसवंत सिंह रावत की फ़ाइल छवि।


🇮🇳 सेला के नाम पर ही पहाड़ी दर्रा और झील का नाम सेला दर्रा और सेला झील रखा गया । इसके आगे की सेना चौकी का नाम नूरा पोस्ट है और इन दोनों से आगे पड़ता है जसवन्त गढ़ ।

खूबसूरत जमी हुई सेला झील- सेला दर्रा, पश्चिम कामेंग, अरुणाचल प्रदेश।

जसवन्त गढ़ का नाम जसवन्त सिंह रावत (एमवीसी) के नाम पर रखा गया।


🇮🇳 जमे हुए सेला दर्रे से गुजरते समय, जसवन्त गढ़ के बर्फीले टुकड़ों पर चलते हुए और नूरा पोस्ट को देखते हुए आपके कानों को चुभने वाली ठंडी हवा वास्तव में सेला-नूरा-जसवंत सिंह की इस खूबसूरत कहानी को बयान करने की कोशिश करती है । 

साभार: lonelymusafir.com

बहादुर सैनिकों #brave_soldiers और उनकी सहयोगियों को शत् शत् नमन !

🇮🇳💐🙏

जय हिन्द 🇮🇳

#आजादी_का_अमृतकाल

 साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 



सूचना:  यंहा दी गई  जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की  कोई गारंटी नहीं है। सूचना के  लिए विभिन्न माध्यमों से संकलित करके लेखक के निजी विचारो  के साथ यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह  की जिम्मेदारी स्वयं निर्णय लेने वाले पाठक की ही होगी।' हम या हमारे सहयोगी  किसी भी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं है | धन्यवाद। ... 

Notice: There is no guarantee of authenticity or reliability of the information/content/calculations given here. This information has been compiled from various mediums for information and has been sent to you along with the personal views of the author. Our aim is only to provide information, readers should take it as information only. Apart from this, the responsibility of any kind will be of the reader himself who takes the decision. We or our associates are not responsible for this in any way. Thank you. 

PM Narendra Modi unveiled the 'Statue of Valour' of Lachit Borphukan, in Jorhat, Assam on March 09 | अहोम जनरल वीर लाचित बोरफुकन की 125 फुट ऊँची कांस्य प्रतिमा का अनावरण

 



PM Narendra Modi unveiled the 'Statue of Valour' of Lachit Borphukan, in Jorhat, Assam on March 09 | प्रधानमंत्री मोदी ने 'वीर योद्धा' अहोम जनरल' लाचित बोरफुकन की 125 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया। 



वन्दे मातरम् 🇮🇳

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने #असम के #जोरहाट के #लहदोईगढ़ में अहोम जनरल वीर लाचित बोरफुकन की 125 फुट ऊँची कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया। प्रतिमा, जिसे 'स्टैच्यू ऑफ वेलोर' कहा जाता है, का अनावरण लाचित बरफुकन मैदाम विकास परियोजना में किया गया था। मोदी ने एक अहोम अनुष्ठान में भाग लिया और उनके साथ मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी थे। 

मुगल सेना के विरुद्ध वर्ष 1671 में #सरायघाट_की_लड़ाई के नेतृत्वकर्ता #वीर_लाचित_बोरफुकन जी को शत् शत् नमन !


Vande Mataram 🇮🇳

Prime Minister Narendra Modi unveiled a 125-feet tall bronze statue of Ahom General Veer Lachit Borphukan at #Ladhoigarh in #Jorhat, #Assam. The statue, called the 'Statue of Valour', was unveiled at the Lachit Barphukan Maidam Development Project. Modi participated in an Ahom ritual and was accompanied by Chief Minister Himanta Biswa Sarma.

Salutes to the brave Lachit Borphukan ji who led the battle of Saraighat against the Mughal army in the year 1671!


#inspirational_personality


🇮🇳💐🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व 

#आजादी_का_अमृतकाल

साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 



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09 मार्च 2024

Ramprasad_Bismil | रामप्रसाद_बिस्मिल

 "न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना

मुझे वर दे यही माता रहूँ #भारत पे दीवाना

करुँ मैं कौम की सेवा पडे़ चाहे करोड़ों दु:ख

अगर फ़िर जन्म लूँ आकर तो भारत में ही हो आना



लगा रहे प्रेम #हिन्दी में, पढूँ हिन्दी लिखूँ हिन्दी

चलन हिन्दी चलूँ, हिन्दी पहरना, ओढना खाना

भवन में रोशनी मेरे रहे हिन्दी चिरागों की

#स्वदेशी ही रहे बाजा, बजाना, राग का गाना

लगें इस देश के ही अर्थ मेरे धर्म, विद्या, धन

करुँ मैं प्राण तक #अर्पण यही प्रण सत्य है ठाना

नहीं कुछ गैर-मुमकिन है जो चाहो दिल से "बिस्मिल" तुम

उठा लो देश हाथों पर न समझो अपना बेगाना"

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#रामप्रसाद_बिस्मिल #Ramprasad_Bismil

🇮🇳💐🙏

🇮🇳 वन्दे मातरम् 🇮🇳

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 



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Zakir Hussain | जाकिर हुसैन | Tabla Player and Composer

 





आज प्रसिद्ध तबला वादक और संगीतकार ज़ाकिर हुसैन का जन्मदिन है. जाकिर हुसैन का जन्म 09 मार्च 1951 को हुआ था. जाकिर हुसैन मशहूर तबला वादक क़ुरैशी अल्ला रखा ख़ान के पुत्र हैं. अल्ला खान भी तबला बजाने में माहिर माने जाते थे. जाकिर हुसैन का बचपन मुंबई में ही बीता. प्रारंभिक शिक्षा और कॉलेज के बाद जाकिर हुसैन ने कला के क्षेत्र में अपने आप को स्थापित करना शुरु कर दिया.

🇮🇳 बारह साल की उम्र से ही जाकिर हुसैन ने संगीत की दुनिया में अपने तबले की आवाज को बिखेरना शुरु कर दिया था. 1973 में उनका पहला एलबम “लिविंग इन द मैटेरियल वर्ल्ड” आया था. उसके बाद तो जैसे जाकिर हुसैन ने ठान लिया कि अपने तबले की आवाज को दुनिया भर में बिखेरेंगे. 1973 से लेकर 2007 तक ज़ाकिर हुसैन विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समारोहों और एलबमों में अपने तबले का दम दिखाते रहे. ज़ाकिर हुसैन भारत में तो बहुत ही प्रसिद्ध हैं ही साथ ही विश्व के विभिन्न हिस्सों में भी समान रुप से लोकप्रिय हैं.

🇮🇳 अपने इस हुनर के लिए ज़ाकिर हुसैन को कई सम्मान और पुरस्कार भी मिले हैं. 1988 में जब उन्हें पद्म श्री का पुरस्कार मिला था तब वह महज 37 वर्ष के थे और इस उम्र में यह पुरस्कार पाने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति भी. इसी तरह 2002 में संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण का पुरस्कार दिया गया था.

🇮🇳 ज़ाकिर हुसैन को 1992 और 2009 में संगीत का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार ग्रैमी अवार्ड भी मिला है.

🇮🇳 आज भी जाकिर हुसैन के तबले का जादू बरकरार है और वक्त के साथ उम्मीद है आगे भी जारी रहेगा.

साभार: jagran.com

🇮🇳 #पद्मश्री, #पद्मभूषण और #पद्मविभूषण से सम्मानित Awarded with #Padmashree, #PadmaBhushan and #PadmaVibhushan.; मशहूर #तबलावादक उस्ताद #जाकिर_हुसैन जी #Tabla player Ustad #Zakir_Hussain को जन्मदिन की हार्दिक बधाई !

🇮🇳🌹🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 



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Dr. Nagendra | डॉ॰ नगेन्द्र (साहित्यकार)



 डॉ॰ नगेन्द्र सर्वतोमुखी प्रतिभासम्पन्न #साहित्यकार थे । वे श्रेष्ठ निबन्धकार, संस्मरणकार, यात्रा वृतान्त लेखक, आलोचक, सम्पादक थे । डॉ॰ नगेन्द्र रसवादी आलोचक माने जाते हैं । वे व्यावहारिक एवं सैद्धान्तिक समीक्षक के रूप में जाने जाते हैं । वे श्रेष्ठ अनुवादक भी रहे हैं ।

🇮🇳 आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी ने कहा है: ”आचार्य नगेन्द्र एक व्यक्ति ही नहीं, संस्था थे ।” उन्होंने अनुसन्धान परिषद की स्थापना के साथ-साथ काव्यशास्त्र के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण ग्रन्धों और अंशों का अनुवाद भी कराया था, साथ ही इन्हें समृद्ध भी कराया था । उन्होंने व्यावहारिक समीक्षक के रूप में नये मानदण्ड स्थापित किये ।

🇮🇳 डॉ॰ नगेन्द्र का जन्म सन् 1916 को #अलीगढ़ के #अमरौली में हुआ था । प्रारम्भ में उन्होंने अंग्रेजी और हिन्दी में एम॰ए॰ किया । तत्पश्चात् हिन्दी से डी॰लिट॰ की उपाधि प्राप्त की । वे आकाशवाणी में भी रहे । नगेन्द्रजी ने दिल्ली विश्वविद्यालय में भी कार्य किया । अपने श्रेष्ठ कृतित्व के लिए वे ”पद्‌मभूषण” तथा ”भारत भारती’ से भी सम्मानित हुए ।

🇮🇳 उन्होंने रीतिकालीन कविता और ‘सुमित्रानन्दन पन्तं’ ‘मैथिलीशरण गुप्त’ की द्विवेदी युगीन कृति ”साकेत” आदि पर रचनात्मक, सैद्धान्तिक, व्यावहारिक समीक्षा लिखी । उन्होंने एक सम्पादक के रूप में भारतीय साहित्य, हिन्दी साहित्य का इतिहास तथा संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य की प्रमुख कृतियां ”साहित्य शास्त्रीय” का अनुवाद कर उसकी टीका भी लिखी ।

🇮🇳 उन्होंने पद्य के क्षेत्र में मौलिक लेखन करते हुए अनुवाद कार्य भी किया । उन्होंने गोल्डस्मिथ द्वारा रचित ”दी ट्रेवलर” का अनुवाद “भ्रांत” शीर्षक से प्रस्तुत किया । यह कार्य मात्र सोलह-सत्रह वर्ष की अवस्था में किया । ”बनमाला” और “छन्दमयी” उनकी खण्डकाव्यात्मक रोमांटिक रचनाएं हैं । इन रचनाओं में पन्त, प्रसाद की छायावादी दृष्टि दिखाई पड़ती है ।

🇮🇳 उन्होंने विचार और अनुभूति, विचार और विश्लेषण, अनुसन्धान और आलोचना, आलोचक की आस्था, आस्था के चरण, नयी समीक्षा, नये सन्दर्भ इत्यादि निबन्ध अपनी भारतीय शैली के उनुक्त चिन्तन के अनुसार लिखे हैं । उनकी शैली में निजीपन है, प्रौढ़ता है । उनके निबन्ध व्यक्तिपरक एवं विषयपरक दोनों ही हैं । उन्होंने चेतना के बिम्ब तन्त्रलोक से मन्त्रलोक तथा अप्रवासी की यात्राएं पर संस्मरण भी लिखे हैं ।

🇮🇳 वे सर्वश्रेष्ठ आलोचक हैं । उन्होंने समीक्षा के नये प्रतिमान स्थापित किये । उनकी छायावादी, प्रगतिवादी, प्रयोगवादी तथा नयी कविता की प्रवृत्तियों की ओर निरन्तर बढ़ती चली गयी । उनका समीक्षक चिन्तन स्वस्थ एवं पूर्वाग्रह से रहित है ।

साभार: hindilibraryindia.com

🇮🇳 #पद्मभूषण और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित #Honored with Padma Bhushan and Sahitya Akademi Award ; भारत के प्रसिद्ध हिन्दी #साहित्यकार #डॉ_नगेन्द्र जी #Literature #Dr_Nagendra



को उनकी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि !

🇮🇳💐🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 



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Dr. Harikrishna Devsare | डॉ. हरिकृष्ण देवसरे

 


ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं, जब कोई #साहित्यकार जानबूझकर साहित्य की उस धारा में दस्तक दे, जिसे उस समय कोई विधा मानने तक को तैयार न हो. फिर आजीवन उसकी साधना करता रहे. लोगों की टीका-टिप्पणी, आलोचना, विवेचना से अलिप्त केवल और केवल शब्द-साधना में जुटा रहे. अपने संपूर्ण बौद्धिक सामर्थ्य, निष्ठा, लगन, आत्मविश्वास, संवेदना, संचेतना, मेहनत, मौलिक दृष्टि, राग-अनुराग, संकल्प-विकल्प, सर्जनात्माकता, सौमनस्यता तथा सपनों से उसे इतना समृद्ध कर दे कि उसका योगदान उस विधा के लिए मील का पत्थर बन जाए. सतत लेखन करता हुआ वह अकेला ही इतनी दूर चला आए कि दूसरों के लिए उसकी उपलब्धियां महज सपना दिखाई पड़ें. फिर अपनी बहुआयामी साधना के बल पर वह लक्ष्यानुरागी एक दिन उस विधा का आइकन बन जाए. हिंदी #बालसाहित्य को ऐसा ही युगप्रवर्तनकारी मुकाम देने का काम किया है‘—डॉ. हरिकृष्ण देवसरे ने.

🇮🇳 उन्होंने न केवल प्रचुर मात्रा में बालसाहित्य रचा, बल्कि इस क्षेत्र में अनेक नई बहसों और आंदोलनों को जन्म देने का श्रेय भी उन्हें प्राप्त है. ये बहसें और आंदोलन हिंदी बालसाहित्य में आधुनिकताबोध तथा उसकी प्रासंगिकता को बनाए के लिए अत्यावश्यक थे. ऐसे आंदोलनों से वे न सिर्फ स्वयं जुड़े, बल्कि नए लोगों को जुड़ने के लिए सतत प्रेरित-प्रोत्साहित करते रहे. इस दौरान बालसाहित्य की धारा में विचलन भी आए. #स्वाधीन भारत में एक ओर नवनिर्माण की प्रेरणा जगाने वाले साहित्य की जरूरत थी, इसलिए प्रगतिशील साहित्यकारों का एक वर्ग सामने आया, जिसमें बालसाहित्यकार भी सामने आए. दूसरी ओर यथास्थिति बनाए रखने के लिए विरोधी साहित्यकारों ने आलोचना-प्रत्यालोचना का सिलसिला बनाए रखा. पर वे डटे रहे. उनका सुदीर्घ लेखकीय सफर हिंदी बालसाहित्य के प्रबोधन का युग है. जिसका एक सूत्र स्वयं डॉ. देवसरे के हाथों में है. उन्होंने खुद लगातार लिखा और निरंतर नए-नए लेखकों को प्रोत्साहन भी करते रहे. उनसे प्रेरित बालसाहित्यकारों की लंबी शृंखला है. वे हिंदी बालसाहित्य में आधुनिकतावादी धारा का नेतृत्व करते हैं. जीवन के सात दशक पार कर चुके देवसरे जी के कलम में आज भी बचपन का जोश और ऊर्जा है.

🇮🇳 कलम के धनी देवसरे ने बालसाहित्य शोध के क्षेत्र में पहली-पहली दस्तक दी, कामयाब हुए और अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लिखा ले गए. संपादकी में कदम रहा तो ‘पराग’ को आधुनिक दृष्टि से संपन्न किया, पत्रकारिता के नए मानक कायम किए. उनके संपादन में निकले अंक आज भी स्तरीय बालसाहित्य तथा उत्कृष्ट संपादन की कसौटी बने हैं. अनुवादकर्म से जुड़े तो बालसाहित्य से लेकर #बालमनोविज्ञान  #child Psychology तक इतनी अनुदित पुस्तकें दीं कि देशी-विदेशी धरोहरों से हिंदी बालसाहित्य निखर उठा. समीक्षाकर्म में उनकी दृष्टि बहुतों के लिए मानक का काम करती रही. यही नहीं, हिंदी में बच्चों के लिए कॉलम लेखन की शुरुआत कर उन्होंने बालअस्मिता को नए आयाम दिए. कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, समीक्षा, आलोचना, पत्रकारिता, संपादन, संयोजन, संस्मरण आदि लेखन के जितने भी क्षेत्र, जितने रंग तथा विधाएं हैं, उन सभी में उन्होंने भरपूर बालसाहित्य रचा. बालसाहित्य के क्षेत्र में तो वे कितने ही आंदोलनों के प्रेरक, जन्मदाता, शुभेच्छु और संचालक हैं. अपने पाठकों का उन्हें भरपूर प्यार मिला. मान-सम्मान और प्रतिष्ठा भी. अनेक पुरस्कार उनके नाम से जुड़कर पुरस्कृत हुए. वे भारतीय बालसाहित्य के ‘प्रेरक-पुरुष’, नक्षत्र हिंदी बालजगत के हैं.

🇮🇳 उनकी यात्रा एक समर्पित शब्दकार की अनथक यात्रा है. जिसमें संघर्ष हैं और बहुत से अवरोधक भी. लेकिन विराम कहीं नहीं है. यहां तक कि बीमारी ने शरीर को जकड़ा, भोजन से अधिक दवाएं खाने का महीनों लंबा सिलसिला चला रहा, तो भी उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा. मस्तिष्क लगातार बालसाहित्य की बेहतरी और उसके उत्थान के बारे में सोचता रहा. कलम निरंतर कागज रंगती रही. अपनी समर्पित साहित्य साधना से उन्होंने बेशुमार प्रतिष्ठा बटोरी. हजारों प्रशंसक बनाए तो दर्जनों ईर्ष्यालु आलोचक भी. देश-विदेश में पहचान बनी. हिंदी बालसाहित्य के लिए वे स्वयं एक आंदोलन, एक मुकाम और एक अनवरत यात्रा हैं. बालसाहित्य के क्षेत्र में उन्होंने नए प्रयोग किए, जिनका प्रमाण हैं, उनकी तीन सौ से अधिक पुस्तकें. हिंदी बालसाहित्य का इतिहास, उनके बिना पूरा हो सके, यह संभव नहीं. उनके बारे में जानना, हिंदी बालसाहित्य की विकास यात्रा से संवाद करना भी है. कमजोर बिंदुओं की पहचान उनके साहित्य में भी की जा सकती है, परंतु उस समय हमें ध्यान रखना होगा कि वे हिंदी बालसाहित्य की नींव के पत्थर तैयार करने वाले बालसात्यिकारों में है. इसलिए वहाँ जो अनगढ़पन है उसी पर हिंदी बालसाहित्य की आज सुंदर इमारत निर्माणाधीन है.

हमारे बालसाहित्यकार का बचपन---

मध्यप्रदेश के #रीवा संभाग में एक जिला है, #सतना. विंध्य की पठारियों पर आबाद, समुद्र तल से 315 मीटर ऊपर, उत्तरप्रदेश की सीमा से गलबहिंया लेता हुआ. तमसा(टोंस), सोन, पसौनी, सतना और सिमरावल जैसी नदियां उनकी पथरीली जमीन को अभिसिंचित करती रहती हैं. इन सबमें प्रमुख नदी है—तमसा. यह कौमुर की पहाड़ियों पर स्थित तमसा कुंड से अपनी यात्रा आरंभ करती है. इतिहास में वह इलाका #बुंदेलखंड के नाम से जाना जाता है. जहाँ के चप्पे-चप्पे पर #वीरता और #बलिदान की गाथाएं  #Stories of bravery and #sacrifice रची गई हैं. वहाँ के लोग आज भी अपनी स्वतंत्र अस्मिता के लिए जूझ रहे हैं. वे लोग भोले हैं. अपनी आन-बान के लिए मर-मिटना उनकी शान रही है. वीरता और साहस उनके रक्त में घुले-मिले हैं. अपने वीर-बांकुरों की गौरव-गाथा यहाँ के लोकगायक ‘हरबोले’ जब भी गाते हैं, तो जरा-जर्जर शिराएं हुंकारने लगती हैं. ‘बुंदेले हरबोलों के मुंह…’ सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता तो सिर्फ बानगी है जो दिखाती है कि वीर बुंदेलों के स्वर में कितना ओज और सोज रहा होगा. महाभारत बाकी देश के लिए इतिहास और नीति की कथा है. पर बुदेलखंड हवा में ‘पंडवानी’ के रूप-स्वर में हुंकारने लगती है, जिसे सुनकर देह में जवानी कसमसाने लगती है. पर असली वीरता तो यहाँ के इतिहास, यहाँ की लोकगाथाओं और यहाँ किलों, बुर्जों के खंडहरों में छिपी है. यहाँ इनकी वीरगाथा सदैव श्लाघनीय रही हों, ऐसा नहीं है. उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही यहाँ के शासक श्रीविहीन होकर अंग्रेजों के पिछलग्गू बन चुके थे. पहले स्वाधीनता संग्राम में उन्होंने अपने ही देशवासियों के विरुद्ध तलवारें भांजी थीं. झाँसी और ग्वालियर के विरुद्ध संग्राम में उन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया. पर वह इतिहास का ऐसा मोड़ था जब बड़े-बड़ों का ईमान डिगा हुआ और हौसला पस्त था.

🇮🇳 बुंदेलखंड का बड़ा हिस्सा कभी रीवा रियासत के अंतर्गत आता था. उसका इतिहास बहुत पुराना है. रामायण और महाभारत में इसका जिक्र आया है. यहीं चित्रकूट स्थल है, जहाँ राम ने वनवास के चौदह वर्ष बिताए थे. तुलसी की याद को संजोए रामवन में तुलसी संग्रहालय है. महाभारत में इस क्षेत्र का उल्लेख है हय, कलचुरी अथवा चेदि वंश के राज्य के रूप में हुआ है. कालांतर में बौद्ध धर्म की बयार चली तो यहां के शासक उसकी शरण में चले गए. परिव्राजक राजाओं का कोट आज भी उन दिनों की याद दिलाता है. गुप्त शासन में यह क्षेत्र मगध के अधीन चला गया. बाद में कुछ वर्षों तक यहाँ मुस्लिम बादशाहों ने राज किया. जिन लोगों ने #जगनकि का ‘आल्ह खंड’ पढ़ा या सुना है, वे आल्हा-ऊदल और उनकी बहादुरी को भी जानते होंगे. उन दोनों रणबांकुरों की गीतिकथाएं आज भी किंल्जिर के किले के खंडहरों में गूँजती हैं. उन्नीसवीं शताब्दी में यह इलाका पिंडारियों से हमले से थरथराने लगा था. उससे घबराकर तत्कालीन श्रीविहीन सम्राट जयसिंह ने अंग्रेजों की शरण ली. अंग्रेजों के इस उपकार का बदला जयसिंह के उत्तराधिकारी राजा रघुराज सिंह ने अंग्रेजों की मदद करके चुकाया. कृतज्ञता अर्पण का सिलसिला यहीं नहीं था. राजनीतिक स्वार्थ ने उसे अपने ही लोगों से लड़वाया. अंग्रेजों की चाटुकारिता को विवश किया. बदले में अंग्रेजों ने उसे ‘हिज हाइनेस’ और महाराजा की पदवी से नवाजा, सोलह तोपों की सलामी दी गई. श्रीविहीन सम्राट युद्ध के मैदान से बाहर तोपों के धमाके सुनकर मुँह मियां मिट्ठू बन लेते हैं. वीर सम्राट को मैदान में टकराती तलवारों की टंकार प्यारी लगती है.

इसी सतना जिले में ही एक तहसील है, #नागोद! अठारहवीं शताब्दी तक यह #उंचेहरा के नाम से जानी जाती थी. उंचेहरा, उच्चकल्प का अपभ्रंश है, जो मगध राज्य के अंतर्गत आता था. सातवीं शताब्दी में यह परिहार राजपूतों की राजधानी थी, जो माउंट आबू से विस्थापित होकर वहाँ पहुँचे थे और वहाँ के गहरवार शासकों को युद्ध में परास्त कर, अपना स्वतंत्रा राज्य कायम किया था. उनके राज्य की सीमाएं महोबा और मऊ को छूती थीं. नौवीं शताब्दी में परिहारों को चंदेलों ने पूर्व की ओर खदेड़ दिया, जहाँ उनके राजा धारा सिंह ने चौदहवीं शताब्दी में नागोद के किले को जीतकर अपना खोया वैभव दुबारा प्राप्त कर लिया. पंद्रहवीं शताब्दी में उंचाहेरा(उच्चकल्प) राजाभोज के अधीन था, जिसने वहां कई भवनों, मंदिरों और धर्मालयों का निर्माण कराया. 1820 में राजा जयसिंह ने जब एक ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधि की, उस समय नागोद पन्ना रियासत का हिस्सा था. 1857 में वहाँ के राघवेंद्र सिंह ने ब्रिटिशों की मदद की. अपनों से दगा का पारितोषिक मिला. चालबाज अंग्रेजों ने उसे ग्यारह गॉंव सहित नागोद की रियासत का मुखिया बना दिया गया. इस अवसर पर उसको नौ तोपों की सलामी भी दी गई. राघवेंद्र सिंह नागोद के राजा कहलाने लगे, जिनकी ‘श्री’ अंग्रेजों के दरबार में बंधक थी.

🇮🇳 नागोद की धरती बड़ी संपन्न है. यहाँ हीरा और पन्ना की खाने हैं. सीमेंट के बड़े-बड़े कारखाने, धुआँ उगलती फैक्ट्रियां हैं. इसी नागोद एक साहित्यकार रहते थे. नाम था #इकबाल_बहादुर_देवसरे. नवाबराय के समकालीन, उनके दोस्तों में से एक. #नवाबराय की तरह ही उनका भी इतिहास लेखन में दखल था. कविता और कहानियां भी लिखते थे. मगर दोनों में एक बुनियादी अंतर था. नवाबराय किसानों और मजदूरों को पात्रा बनाते, इकबाल बहादुर देवसरे के पात्रा इतिहास के उपेक्षित और तिरष्कृत नायक थे. भूले-बिसरे चेहरे. इतिहास के कूड़ेदान में दबे, चंद फूल और कलियां. इकबाल बहादुर उन्हीं बिसरा दिए गए नायकों तथा अनूठे चरित्रों को अपने उपन्यासों के माध्यम से उजाले में लाने का प्रयास करते रहते. लिखना उनके लिए साधना थी. एक बार कलम उठाते तो मानो भाव-समाधि में चले जाते. खाना-पीना सब बिसर जाता. चेतना पात्रों के साथ हिल-मिल जाती. मन दौड़ता, कलम चलती और घटनाएं शब्दबद्ध होकर कागज को रंगती चली जातीं. रचना पूरी होते ही इतिहास का वह कोना स्फटिक-सा चमचमा उठता, जिसे वक्त विस्मृति के गर्त में ढकेल चुका था. समय की महानदी में डूब चुकी संवेदनाएं किनारे लगकर सीप-सी झिलमिलाने लगतीं. कागज पर उकेरे गए शब्द अतीत का प्रामाणिक आइना बन जाते.

एक किस्सा है, एक बार किसी उपन्यास को लिखने बैठे तो बस लिखते रहे. घंटों बीत गए. बहु विभा परेशान. दो-एक बार वे दरवाजे की ओट से ‘ससुरजी’ को लेखन में डूबे देख चुकी थीं. चाहती थीं कि लिखना रोक चाय-नाश्ते की भी सुध लें. लेकिन एक सर्जक की एकाग्रता में विघ्न कैसे डालें! एक बार हिम्मत करके पास तक आईं. वहाँ जो देखा तो हैरान रह गईं. #कलम की स्याही तो कभी की खत्म हो चुकी थी, किंतु भाव-तरंग में डूबे सर्जक को उसका जरा-भी भान ही नहीं था. वह तो अपने पात्रों के साथ इतिहास में उतरा हुआ था. हाथ कलम के साथ थे, मन पात्रों के बीच, उनके अनुभव और सोच से गुजरता, दूर अतीत में गोते खाता, घटनाओं का साक्षी बना हुआ. ‘बहू’ ने सोचा थोड़ी देर बाद जान जाएंगे कि शब्द सिर्फ हवा में विचर रहे हैं. इसलिए वे वहां से हट गईं. पर उत्सुकता के कारण अधिक देर के दूर न रह सकी. अनचीन्ही आशंका और कौतूहल उन्हें थोड़ी देर बाद फिर समाधिरत लेखक के करीब ले गए. इस बार फिर वही झटका. कलम की हवाई यात्रा अब भी पूर्ववत जारी थी. इसबार वे स्वयं पर संयम न रख सकीं. ‘ससुरजी’ को टोका तो जैसे वे तंद्रा से बाहर आए. अपनी बेखुदी पर खुद हैरान. ‘बहू’ के आगे कुछ शर्मिंदा भी. उसके बाद ‘ससुरजी’ के लिए तीन-चार पेन भरकर रखने की जिम्मेदारी बहू ने स्वयं सँभाल ली.

🇮🇳 1923 तक नवाबराय की भांति वे भी उर्दू में लिखते रहे. उसके बाद नवाबराय हिंदी के प्रेमचंद बने और उपन्यास सम्राट कहलाए. इकबाल बहादुर देवसरे जो थे, वही बने रहे. लेकिन अपने दोस्त की तरह वे भी उर्दू का दामन छोड़ हिंदी की शरण में आ गए. यह बात अलग है कि वर्षों तक उर्दू में रमा रहा दिमाग अब भी उसी भाषा में सोचता. कलम अलिफ-बे-ते लिखते समय ज्यादा सहज नजर आती. अपनी हर नई पुस्तक का पहला ड्राफ्ट वे उर्दू में तैयार करते. बाद में उसको हिंदी में सुधारते. सही अनुवाद के लिए बेटे या बहू की मदद भी लेते. इस बात से अनजान की चाहे-अनचाहे इस तरह वे अपने बेटे-बहू के मन में भी साहित्य का बिरवा रोप रहे हैं. उस पौधे को पानी दे रहे हैं, जो एक दिन हिंदी बालसाहित्य के नए शिखर का निर्माण करने वाला सिद्ध होगा. इतिहास का वह कालखंड स्वतंत्रा बालसाहित्य की अवधारणा से दूर था.

🇮🇳 लेखक चाहे उर्दू का हो या हिंदी का. सिर्फ लिखकर तो पेट भर नहीं सकता. पेट भरने के लिए इकबाल बहादुर देवसरे अध्यापन से जुड़े थे. भावुक और संवेदनशील. ऐसा ही उनका विषय था. संवेदनाओं और कलात्मकता से भरपूर. जी हाँ, वे बच्चों को ड्राइंग पढ़ाते थे. लेकिन उनकी कलात्मकता सिर्फ रंगों को सजाने-संवारने तक सीमित न थी. साहित्य और कला के साथ उन्हें संगीत-प्रेम भी उपहार में मिला था. सधी उंगलियां हारमोनियम पर भी स्वर निकाल सकती थीं. गद्य और पद्य दोनों में उनका समान दखल था. कविता-कहानी-उपन्यास हर विधा में उन्होंने स्तरीय लेखन किया. लेकिन उपन्यास विधा को उन्होंने विशेषरूप से समृद्ध किया. उपन्यास भी दो-चार नहीं, पूरे अठारह. भारी-भरकम. अधिकांश ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं पर आधारित हैं. उनके अलावा कविताएं, कहानी और लेख भी. उनके लेखन में राजशाही और सामंतवाद का वह वैभव देखने को मिलता है, जिसकी नियति अपने ही बोझ से दबकर इतिहास बन जाना था. और वही हुआ भी था.

उन्हीं इकबाल बहादुर देवसरे के घर हरिकृष्ण देवसरे का जन्म हुआ, 3 मार्च, 1940 को. माँ #धर्मपरायण थीं. रामायण की अनुरागी. घर का काम करते-करते उसकी चौपाइयां गुनगुनाती रहतीं. मन हरिभजन में लगा रहता था. बेटे को पुकारने पर ‘हरिनाम’ अपने आप उच्चारा जाए, यही सोचकर उन्होंने बेटे का नाम ‘हरिकृष्ण’ रखा था. प्यार से वे उसको ‘हरि’ कहकर बुलातीं. हरि को उन्होंने बड़ी तपस्या के बाद पाया था. उनसे पहले एक बेटे की असमय मृत्यु हो चुकी थी. नवांकुर के साथ भी प्रकृति कोई क्रूर खेल न खेल जाए, यही सोचकर जन्म के साथ ही उसका एक कान नोंच दिया गया. देवी तो देवी है. भले ही मौत की हो, वह जूठी भेंट भला क्यों लेगी! इसलिए उसकी नजर पड़ने से पहले ही शिशु ‘हरि’ को जूठा कर दिया गया. गँवई मन का भोला विश्वास. एक मिथ. मान लिया गया कि इससे बेटा बुरी नजर और आसन्न विपदाओं से दूर रहेगा.

🇮🇳 इसी के साथ-साथ एक और टोटका सालों-साल चलता रहा. हर जन्म दिन के अवसर पर सात सुहागिनें घर में जुटतीं. बालक हरि को एक छबरिया में बिठाया जाता. मां बेटे के लिए मंगल कामना करती, मनौतियां माँगती. लंबी उम्र के लिए प्रार्थनाएं करती. सातों सुहागिनें भी मंगलगीत में साझा करते हुए एक साथ उस छबरिया को खींचतीं. स्त्री का जीवन तप का जीवन है. फिर सुहागिन जीवन तो…अबोल-अनूठी-अनमोल साधना है. दिन-भर घर-गृहस्थी के काम में जुटना. सास-ससुर की सेवा, पशुओं की देखभाल. ऊपर से जब-तब बड़ों की डॉंट-फटकार और वर्जनाओं को सुनना. फिर घूँघट की ओट से चुपचाप सहते जाना.

🇮🇳  ऐसा जन्म, जिंदगी पाकर भी जो स्त्री रात को मग्न-मन पति और घर के बुजुर्गों के पाँव दबाए, पति-परमेश्वर की सेज सजाए, वंश चलाने के उसका अंश अपने गर्भ में धारण करे, करवाचौथ के दिन स्वयं निर्जला रहकर पति और बच्चों के लिए लंबी उम्र, सुख-समृद्धि की कामना करे—उसकी बोल-बानी, हाथ-परस में जस तो होगा ही. उसी जस का थोड़ा हिस्सा बालक के बुरी बलाओं से बचाने के काम आए, उसको किसी की नजर न लगे, इसलिए सातों सुहागिनें छबरिया को खींचकर अपने परस से शिशु को अभय-वर देतीं. शिशु जब तक बैठने लायक रहता, तब तक वे उसको बिठाकर खींचती. सँभलकर दौड़ लगाने लायक हो जाता तो उसको छबरिया में खड़ा कर दिया जाता. और सातों सुहागिनें उसको बस छू-भर देतीं. उनके छूते ही मामूली छबरिया बच्चे की ढाल बन जाती. मंगलगीत अदृश्य कवच-कुंडल में ढल जाते.

🇮🇳 इलाके की परंपरा. रस्म के बाद छबरिया को बहुत सहेजकर रखा जाता. साल-दर-साल. बालक जवान हो जाता. विवाह के लिए रिश्ते आने लगते, तब भी वह टोटका अन्टोक जारी रहता. विवाह की शहनाई बजने को होती, तभी उस छबरिया के विसर्जन का समय आता. विसर्जन के समय की भी रीति-रिवाज और परंपराएं थीं. शादी पक्की होते ही छबरिया को वधु-गृह भिजवा दिया जाता. वहाँ से वह मिठाइयों से भरकर वापस आती. एक और सुहागिन के साथ. साथ आई मिठाई को गॉंव-जवार सब जगह बँटवाया जाता. मानो इतनी देर तक सुहागिनों के आशीर्वाद फलने पर खुशी मनाई जा रही हो. उस खुशी पर गॉंव-ज्वार के सब लोग मुँह मीठा कर लें, तब जाकर वह रस्म पूरी होती. माता-पिता के साथ वे सुहागिनें भी मानो निश्चिंत हो जातीं. शायद यह सोचकर कि जातक की रक्षा के लिए उनकी जगह एक और सुहागिन है. पतिव्रता स्त्री जो उसके लिए करवाचौथ का व्रत रखेगी. आवश्यकता पड़ने पर वह सावित्री की भाँति पति के लिए यमराज से भी टक्कर ले सकती है. भारतीय संस्कृति स्त्री के ऐसे ही बलिदानों और संकल्पगाथाओं की न जाने कितनी कहानियां समेटे हुए है. हर स्त्री का जीवन अपने आप में एक बलिदान-कथा ही तो है.

साभार: ओमप्रकाश कश्यप

jagran.com (2013)

🇮🇳 साहित्य अकादमी बाल साहित्य लाइफटाइम पुरस्कार से सम्मानित; प्रसिद्ध #बाल #साहित्यकार एवं संपादक #हरिकृष्ण_देवसरे जी को उनकी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि !

🇮🇳💐🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल


साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 



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