02 फ़रवरी 2026

द्वापर युग | Dvāpara-yuga | धर्म और अधर्म के संघर्ष का युग


द्वापर युग: धर्म और अधर्म के संघर्ष का युग

सनातन धर्म में समय को चार युगों में बाँटा गया है — सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग
इनमें द्वापर युग वह काल है जहाँ धर्म और अधर्म आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। यह केवल एक पौराणिक काल नहीं, बल्कि मानव मन के द्वंद्व, राजनीति, संबंधों और कर्तव्य के संघर्ष का प्रतीक है।

इसी युग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया और मानवता को कर्म, भक्ति और नीति का मार्ग दिखाया।


द्वापर युग क्या है?

द्वापर युग, त्रेता युग के बाद और कलियुग से पहले आता है।

धर्म की स्थिति इस युग में और घट गई थी —

  • सत्ययुग: 100% धर्म

  • त्रेता: 75%

  • द्वापर: 50%

यानी आधा धर्म, आधा अधर्म।
मनुष्य के अंदर अच्छाई भी थी और स्वार्थ, ईर्ष्या, छल भी बढ़ चुके थे।


द्वापर युग की मुख्य विशेषताएँ

1️⃣ धर्म और अधर्म का सीधा संघर्ष

इस युग की सबसे बड़ी पहचान है — महाभारत युद्ध
यह युद्ध केवल राज्य के लिए नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच था।

2️⃣ राजनीति और कूटनीति का विकास

जहाँ त्रेता युग में मर्यादा प्रधान थी, वहीं द्वापर युग में नीति, रणनीति और बुद्धि का महत्व बढ़ गया।
शक्ति से ज्यादा बुद्धि काम आने लगी।

3️⃣ परिवारों में विभाजन

कौरव और पांडव एक ही कुल के होते हुए भी शत्रु बन गए।
यह दर्शाता है कि जब स्वार्थ बढ़ता है, तो रिश्ते भी टूट जाते हैं।


श्रीकृष्ण – द्वापर युग के मार्गदर्शक

द्वापर युग का केंद्र हैं भगवान श्रीकृष्ण
वे केवल भगवान ही नहीं, बल्कि दार्शनिक, राजनीतिज्ञ, मित्र, गुरु और मार्गदर्शक थे।

कृष्ण के जीवन से मिलने वाली शिक्षाएँ

🔹 कर्म ही धर्म है
गीता का संदेश — कर्म करो, फल की चिंता मत करो।

🔹 स्थिति के अनुसार नीति बदलती है
जहाँ राम मर्यादा के प्रतीक थे, वहीं कृष्ण व्यवहारिक धर्म के प्रतीक हैं।

🔹 सत्य की रक्षा के लिए बुद्धि भी जरूरी है

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महाभारत – द्वापर युग की सबसे बड़ी घटना

महाभारत केवल युद्ध नहीं, बल्कि जीवन का दर्पण है।

युद्ध के कारण:

  • दुर्योधन का अहंकार

  • सत्ता की लालसा

  • अन्याय

  • द्रौपदी का अपमान

यह दर्शाता है कि जब अन्याय बढ़ता है, तो संघर्ष अनिवार्य हो जाता है।


भगवद्गीता – द्वापर युग का अमर संदेश

महाभारत युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया, वही भगवद्गीता है।

गीता सिखाती है:

✔ जीवन एक युद्ध है
✔ मोह और भ्रम छोड़ो
✔ कर्तव्य निभाओ
✔ आत्मा अमर है

यह केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन की सर्वोच्च पुस्तक है।


द्वापर युग का समाज

🔹 शस्त्र और शास्त्र दोनों का महत्व

लोग युद्ध कला में भी निपुण थे और ज्ञान में भी।

🔹 विज्ञान और दिव्य अस्त्र

इस युग में ब्रह्मास्त्र, दिव्यास्त्र जैसे शक्तिशाली अस्त्रों का वर्णन मिलता है।

🔹 गुरु-शिष्य परंपरा

द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे गुरु युद्धकला सिखाते थे।


दुर्योधन और कौरव – अधर्म का प्रतीक

दुर्योधन बलशाली था, परंतु ईर्ष्या और अहंकार ने उसे अंधा बना दिया।
उसने कभी यह नहीं सोचा कि अन्याय की नींव पर बना राज्य टिक नहीं सकता।


पांडव – धर्म के प्रतीक

पांडवों ने जीवन में अपमान, वनवास और कठिनाइयाँ झेली, पर धर्म का साथ नहीं छोड़ा।
यही कारण है कि अंत में विजय उनकी हुई।


द्वापर युग का आध्यात्मिक अर्थ

यह युग दर्शाता है कि जीवन हमेशा स्पष्ट नहीं होता।
कभी-कभी सही और गलत के बीच निर्णय लेना कठिन होता है।
ऐसे समय में आत्मज्ञान और विवेक ही मार्ग दिखाते हैं।


त्रेता और द्वापर में अंतर

त्रेता युगद्वापर युग
मर्यादा प्रधाननीति प्रधान
श्रीराम का आदर्शश्रीकृष्ण की लीला
स्पष्ट धर्मजटिल धर्म

द्वापर युग से मिलने वाली जीवन शिक्षाएँ

✔ अन्याय सहना भी अधर्म है
✔ बुद्धि का उपयोग धर्म के लिए करें
✔ मोह छोड़कर कर्तव्य निभाएँ
✔ सच्चाई अंत में जीतती है


आज के समय में द्वापर युग की प्रासंगिकता

आज भी:

  • राजनीति में चालें हैं

  • रिश्तों में स्वार्थ है

  • सत्य और असत्य का संघर्ष है

ऐसे समय में गीता का संदेश हमें दिशा देता है।

द्वापर युग हमें सिखाता है कि जीवन केवल सफेद और काला नहीं होता, बीच में धूसर रंग भी होते हैं।

सही निर्णय वही ले सकता है, जिसके पास विवेक, धैर्य और धर्म की समझ हो।

कृष्ण का संदेश आज भी गूंजता है —
कर्म करो, धर्म के साथ खड़े रहो, विजय निश्चित है।

द्वापर युग – जब धर्म और अधर्म आमने-सामने थे

यह वह समय था जब रिश्तों से ज़्यादा सत्ता, और सत्य से ज़्यादा स्वार्थ हावी होने लगा था।
तभी जन्म हुआ योगेश्वर श्रीकृष्ण का —
जो केवल भगवान नहीं, बल्कि जीवन के महान मार्गदर्शक बने।

कुरुक्षेत्र की भूमि पर, अर्जुन के संशय को दूर कर
उन्होंने दिया गीता का अमर ज्ञान

⚔ अन्याय सहना भी अधर्म है
🕉 कर्म करो, फल की चिंता मत करो
🔥 सत्य के साथ खड़े रहना ही सच्चा धर्म है

द्वापर युग हमें सिखाता है कि
जब जीवन युद्ध जैसा लगे, तो श्रीकृष्ण की गीता रास्ता दिखाती है।

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