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जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कलियुग Kaliyug पतन का युग या जागरण का अवसर ?

  🔱 कलियुग: पतन का युग या जागरण का अवसर? हिंदू धर्म में समय को चक्र के रूप में देखा गया है। यह चक्र चार युगों में विभाजित है — सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग । वर्तमान समय को शास्त्रों में कलियुग कहा गया है। सामान्य धारणा है कि यह अंधकार, पाप, भ्रम और अधर्म का युग है। लेकिन क्या कलियुग केवल पतन का समय है, या यह आत्मजागरण का भी सबसे बड़ा अवसर है? आइए समझते हैं कलियुग का वास्तविक अर्थ, लक्षण, कारण और इससे मिलने वाली सीख। ⏳ कलियुग क्या है? “कलि” शब्द का अर्थ है — कलह, अशांति, अधर्म और अज्ञान । श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णन है कि जब धर्म का प्रभाव कम और अधर्म का प्रभाव अधिक हो जाता है, तब कलियुग का आरंभ होता है। मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के बाद कलियुग का प्रारंभ हुआ। 📜 शास्त्रों में वर्णित कलियुग के लक्षण पुराणों में कलियुग के कई संकेत बताए गए हैं, जिनमें से अनेक आज के समय में स्पष्ट दिखाई देते हैं: 1️⃣ धर्म का क्षय धर्म केवल दिखावे तक सीमित रह जाएगा। लोग धार्मिक होंगे, पर आचरण में धर्म नहीं होगा। 2...

Sapta Chiranjeevi | सप्त चिरंजीवी | हिन्दू धर्म के वे अमर महापुरुष जो आज भी जीवित माने जाते हैं

सप्त चिरंजीवी: हिन्दू धर्म के वे अमर महापुरुष जो आज भी जीवित माने जाते हैं हिन्दू धर्म की कथाएँ केवल इतिहास या आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जीवन दर्शन और आध्यात्मिक संदेशों से भरी हुई हैं। इन्हीं कथाओं में एक अद्भुत अवधारणा है — “सप्त चिरंजीवी” । “चिरंजीवी” का अर्थ है — जो चिरकाल तक जीवित रहे । हिन्दू मान्यता के अनुसार कुछ महापुरुष ऐसे हैं जिन्हें विशेष वरदान प्राप्त हुआ कि वे युगों-युगों तक पृथ्वी पर जीवित रहेंगे। इनका उद्देश्य केवल जीना नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा और मानवता का मार्गदर्शन करना है। सप्त चिरंजीवी कौन हैं? शास्त्रों में इन सात अमर विभूतियों का उल्लेख मिलता है: अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः । कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ॥ अर्थात् — अश्वत्थामा, राजा बलि, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम — ये सातों चिरंजीवी हैं। 1️⃣ अश्वत्थामा अश्वत्थामा, द्रोणाचार्य के पुत्र थे। महाभारत युद्ध में उन्होंने कौरव पक्ष से युद्ध किया। युद्ध के बाद क्रोध में उन्होंने पांडवों के पुत्रों का वध किया, जिसके कारण भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें श्राप दिया — वे अमर रहे...

आयुर्वेद | Ayurveda | Natural Healing | संतुलित जीवन और संपूर्ण स्वास्थ्य

आयुर्वेद: संतुलित जीवन और संपूर्ण स्वास्थ्य की प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान के पास समय कम है और बीमारियाँ ज़्यादा। तनाव, गलत खान-पान, नींद की कमी और प्रदूषण ने स्वास्थ्य को गंभीर चुनौती दी है। ऐसे समय में एक प्राचीन भारतीय विज्ञान फिर से लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है — आयुर्वेद । आयुर्वेद केवल रोगों का इलाज नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन जीने की कला है। यह शरीर, मन और आत्मा के संतुलन पर आधारित चिकित्सा पद्धति है, जो हजारों वर्षों से भारत की अमूल्य धरोहर रही है। आयुर्वेद क्या है? “आयुर्वेद” दो शब्दों से मिलकर बना है — आयु (जीवन) + वेद (ज्ञान) अर्थात् — जीवन का विज्ञान । यह विज्ञान सिखाता है कि कैसे प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर स्वस्थ और दीर्घायु जीवन जिया जाए। आयुर्वेद का इतिहास आयुर्वेद की उत्पत्ति वेदों से मानी जाती है। ऋग्वेद और अथर्ववेद में इसके मूल सिद्धांत मिलते हैं। महान आयुर्वेदाचार्य: चरक — आंतरिक चिकित्सा (चरक संहिता) सुश्रुत — शल्य चिकित्सा (सुश्रुत संहिता) वाग्भट — अष्टांग हृदयम ये ग्रंथ आज भी आयुर्वेद की नींव माने जाते है...

योग YOGA सेहत, संतुलन और आत्मशांति की ओर एक मार्ग

  योग: सेहत, संतुलन और आत्मशांति की ओर एक मार्ग आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में इंसान के पास सब कुछ है — साधन, सुविधाएँ, तकनीक — लेकिन अगर कुछ कम होता जा रहा है तो वह है मानसिक शांति और शारीरिक संतुलन । तनाव, चिंता, अनिद्रा, थकान और बीमारियाँ आधुनिक जीवन की पहचान बन चुकी हैं। ऐसे समय में एक प्राचीन भारतीय विधा फिर से लोगों को सहारा दे रही है — योग । योग केवल व्यायाम नहीं है, यह शरीर, मन और आत्मा को जोड़ने की एक पूर्ण जीवनशैली है। यह हमें बाहरी दुनिया के शोर से निकालकर भीतर की शांति से जोड़ता है। योग क्या है? “योग” शब्द संस्कृत धातु युज् से बना है, जिसका अर्थ है — जोड़ना । योग का मतलब है — शरीर, मन और आत्मा का मेल। महर्षि पतंजलि ने योग को परिभाषित किया: “योगश्चित्तवृत्ति निरोधः” अर्थात्, चित्त की वृत्तियों (विचारों) का नियंत्रण ही योग है। आज योग केवल भारत तक सीमित नहीं है; पूरी दुनिया इसे स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिए अपना रही है। योग का इतिहास योग की परंपरा हजारों साल पुरानी है। इसकी जड़ें वेदों, उपनिषदों और भगवद्गीता में मिलती हैं। ऋषि-मुनियों ने ध्यान और साधना के म...

आदि शंकराचार्य | Shankaracharya | अद्वैत वेदांत के महान आचार्य और सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण पुरुष

  आदि शंकराचार्य: अद्वैत वेदांत के महान आचार्य और सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण पुरुष भारत की आध्यात्मिक परंपरा में अनेक ऋषि, मुनि और संत हुए, लेकिन आदि शंकराचार्य का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उन्होंने केवल दर्शन नहीं दिया, बल्कि एक सोई हुई आध्यात्मिक चेतना को पुनर्जीवित किया। वे केवल एक संन्यासी नहीं थे, बल्कि दार्शनिक, धर्म-संरक्षक, कवि, वाद-विवाद के अद्वितीय आचार्य और सांस्कृतिक एकता के महान निर्माता थे। जब भारत में विभिन्न मत, पंथ और दार्शनिक विचारधाराएँ आपस में उलझ रही थीं, तब शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के माध्यम से यह संदेश दिया – “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः” अर्थात् ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, और जीव स्वयं ब्रह्म ही है। जन्म और बाल्यकाल आदि शंकराचार्य का जन्म लगभग 8वीं शताब्दी में केरल के कालड़ी (Kalady) नामक स्थान पर हुआ। उनके माता-पिता शिवभक्त थे। किंवदंती के अनुसार भगवान शिव के आशीर्वाद से उनका जन्म हुआ। बचपन से ही शंकर असाधारण प्रतिभाशाली थे। उन्होंने बहुत कम आयु में वेद, उपनिषद और शास्त्रों का गहन अध्ययन कर लिया था। मात्र 8 वर्ष की आयु ...

वेद क्या हैं? | What Are the Vedas – सनातन ज्ञान का शाश्वत स्रोत

वेद क्या हैं? | What Are the Vedas – सनातन ज्ञान का शाश्वत स्रोत भारत की आध्यात्मिक परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध परंपराओं में से एक मानी जाती है। इस दिव्य परंपरा की जड़ें वेदों में समाई हुई हैं। वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन, प्रकृति, ब्रह्मांड, विज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम हैं। “वेद” शब्द का अर्थ है — ज्ञान। यह ज्ञान किसी व्यक्ति द्वारा रचित नहीं, बल्कि ऋषियों द्वारा ध्यान और तपस्या के माध्यम से “श्रुति” रूप में प्राप्त हुआ। इसलिए वेदों को अपौरुषेय (मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं) माना जाता है। वेदों की उत्पत्ति और महत्व हजारों वर्ष पूर्व, जब न कोई लिखित भाषा थी और न आधुनिक विज्ञान, तब भारतीय ऋषि गहन साधना में लीन होकर ब्रह्मांडीय सत्य को अनुभव करते थे। यही अनुभव बाद में मंत्रों के रूप में संरक्षित हुए, जिन्हें हम आज वेद कहते हैं। वेदों को मानव सभ्यता की सबसे पुरानी आध्यात्मिक धरोहर माना जाता है। इनमें न केवल ईश्वर की उपासना है, बल्कि: प्रकृति के नियम जीवन का उद्देश्य नैतिकता चिकित्सा संगीत खगोल विज्ञान जैसे विषय भी मिल...

पुराण क्या हैं? | Puran in Hinduism | सनातन धर्म के 18 पुराणों का महत्व, ज्ञान और रहस्य

पुराण क्या हैं? सनातन धर्म के 18 पुराणों का महत्व, ज्ञान और रहस्य Puranas in Hinduism – Meaning, Importance and Knowledge सनातन धर्म केवल पूजा-पाठ का धर्म नहीं, बल्कि ज्ञान, इतिहास, आस्था और जीवन दर्शन का विशाल महासागर है। इस ज्ञान को सरल भाषा में आम लोगों तक पहुँचाने के लिए जिन ग्रंथों की रचना की गई, उन्हें पुराण कहा जाता है। पुराण केवल धार्मिक कथाएँ नहीं, बल्कि मानव जीवन का मार्गदर्शन , नैतिक शिक्षा , इतिहास , विज्ञान , भक्ति , और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम हैं। 🔶 पुराण शब्द का अर्थ “पुराण” शब्द संस्कृत के ‘पुरा’ (प्राचीन) और ‘ण’ (नवीन) से बना है। अर्थात — जो प्राचीन होते हुए भी सदैव नवीन ज्ञान देता है। 📜 पुराणों की रचना किसने की? पुराणों के रचयिता महर्षि वेदव्यास माने जाते हैं। उन्होंने वेदों के गूढ़ ज्ञान को सरल कहानियों के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाने के लिए पुराणों की रचना की। ये भी देखे  👇 धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – जीवन के चार पुरुषार्थ 🌟 18 महापुराण कौन-कौन से हैं? सनातन धर्म में कुल 18 महापुराण बताए गए हैं: ब्रह्म पुराण पद्म पुराण विष्णु पु...

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संतुलन ही सफलता और शांति की कुंजी है | Dharm, Arth, Kam, Moksh – The Four Goals of Human Life

  धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – जीवन के चार पुरुषार्थ का सम्पूर्ण मार्गदर्शन (Dharma, Artha, Kama, Moksha – The Four Goals of Human Life) मानव जीवन केवल जन्म और मृत्यु के बीच की यात्रा नहीं है, बल्कि यह एक उद्देश्यपूर्ण साधना है। सनातन धर्म ने जीवन को समझने और उसे सार्थक बनाने के लिए चार मुख्य लक्ष्य बताए हैं, जिन्हें चार पुरुषार्थ कहा जाता है — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । ये केवल धार्मिक अवधारणाएँ नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन का पूर्ण विज्ञान हैं। इस लेख में हम जानेंगे कि ये चारों पुरुषार्थ क्या हैं, क्यों महत्वपूर्ण हैं, और कैसे ये हमारे जीवन को संतुलित, सफल और अंततः मुक्त बना सकते हैं। 🔶 पुरुषार्थ क्या है? ‘पुरुषार्थ’ दो शब्दों से बना है — पुरुष (मनुष्य) और अर्थ (लक्ष्य)। अर्थात, मानव जीवन के चार मुख्य उद्देश्य । वेद, उपनिषद, महाभारत और रामायण में इनका विस्तार से वर्णन मिलता है। ये बताते हैं कि जीवन केवल भोग या त्याग के लिए नहीं, बल्कि संतुलन के लिए है। 🟡 1. धर्म (Dharma) – जीवन का आधार ✔ धर्म क्या है? धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं है। धर्म = कर्तव्य + नैतिकता + सत...