वास्तु शास्त्र सिर्फ ईंट–पत्थर का विज्ञान नहीं, बल्कि ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित करने का प्राचीन भारतीय ज्ञान है। यह बताता है कि हमारा घर केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि विचारों, व्यवहार और सफलता को प्रभावित करने वाला ऊर्जा–केन्द्र है।
जहाँ वास्तु होता है, वहाँ सकारात्मक ऊर्जा, स्वास्थ्य, समृद्धि और शांति बसती है।
सूचना: यंहा दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की कोई गारंटी नहीं है। सूचना के लिए विभिन्न माध्यमों से संकलित करके लेखक के निजी विचारो के साथ यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह की जिम्मेदारी स्वयं निर्णय लेने वाले पाठक की ही होगी।' हम या हमारे सहयोगी किसी भी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं है | धन्यवाद। ...
Notice: There is no guarantee of authenticity or reliability of the information/content/calculations given here. This information has been compiled from various mediums for information and has been sent to you along with the personal views of the author. Our aim is only to provide information, readers should take it as information only. Apart from this, the responsibility of any kind will be of the reader himself who takes the decision. We or our associates are not responsible for this in any way. Thank you.
हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व है, और कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी— देवउठनी एकादशी, जिसे Prabodhini Ekadashi देव प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है—सबसे पवित्र मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा (चातुर्मास) के बाद जागते हैं, और फिर से संसार के पालन में सक्रिय होते हैं।
देवउठनी एकादशी क्या है?
आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु “शयन” करते हैं, और कार्तिक शुक्ल एकादशी को “उठते” हैं।
यह दिन भगवान विष्णु के जागरण का प्रतीक है
और माना जाता है कि इस दिन से सारे शुभ एवं मांगलिक कार्य जैसे—विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, नए काम की शुरुआत—फिर से शुरू किए जा सकते हैं।
शुभ मुहूर्त (Dev Uthani Ekadashi 2025)
वैदिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 1 नवंबर 2025 शनिवार को सुबह 9 बजकर 12 मिनट से प्रारंभ होकर 2 नवंबर 2025 रविवार को शाम 7 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगी।देवउठनी एकादशी की कथा
कथा के अनुसार, भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले गए, और इस अवधि में
धरती पर विवाह, यज्ञ, गृहप्रवेश आदि शुभ कार्य रोक दिए जाते हैं।
देव उठनी के दिन देवी तुलसी और भगवान विष्णु का प्रतीक विवाह किया जाता है, जिसे तुलसी–विवाह कहा जाता है।
कहते हैं
जहाँ तुलसी होती है, वहाँ स्वयं श्रीहरि का वास होता है।
देवउठनी एकादशी की पूजा विधि
1.सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2.भगवान विष्णु और तुलसी के पौधे की पूजा करें।
3.तुलसी विवाह का आयोजन करें (रंगोली, दीपक, फल, मिष्ठान्न रखें)।
4."ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः" का जाप करें।
5.व्रत रखने वाले शाम को फलाहार करते हैं।
इस दिन दीपदान, तुलसी पूजा और गंगा स्नान का विशेष महत्व है।
तुलसी विवाह का महत्व
तुलसी विवाह के पीछे संदेश है
“जहाँ पवित्रता और भक्ति है, वहीं विष्णु का निवास है।”
"Where there is purity and devotion, there resides Vishnu."
तुलसी विवाह वस्तुतः शुभता और नए आरंभ का प्रतीक है।
देवउठनी एकादशी का संदेश
उत्सव Celebration
नई शुरुआत New Beginnings
शुभ कार्यों का आरंभ Start of Auspicious Work
आध्यात्मिक शुद्धि Spiritual Purification
यह दिन हमें बताता है कि हर अंत एक नई शुरुआत लेकर आता है।
देवउठनी एकादशी केवल पूजा नहीं, बल्कि नए अध्याय के आरंभ का संदेश है।
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🌿 “कल्पवृक्ष – जहाँ ✨ इच्छाएँ पूर्ण होती हैं, मन शांत होता है” 🔱
“Kalpavriksha – Where desires are fulfilled, the mind is at peace”
हम अक्सर सुनते हैं — "कल्पवृक्ष के नीचे बैठो, तुम्हारी मनोकामनाएँ पूरी होंगी।"
लेकिन क्या वास्तव में कोई ऐसा वृक्ष है?
हिंदू धर्म के ग्रंथों में कल्पवृक्ष या कल्पतरु को इच्छापूर्ति करने वाला दिव्य वृक्ष माना गया है। इसका उल्लेख समुद्र मंथन में मिलता है, जहाँ यह रत्नों में से एक के रूप में प्रकट हुआ था।
🌿 कल्पवृक्ष क्या है?
कल्पवृक्ष एक ऐसा वृक्ष है जो केवल भौतिक वस्तुएँ ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पूर्णता भी देता है।
"कल्पतरु वह है जो मनुष्य की ‘इच्छा’ को ‘वास्तविकता’ में बदल दे।"
लेकिन यहाँ "इच्छा" का अर्थ केवल भौतिक लाभ नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष, शांति और आध्यात्मिक उन्नति है।
कल्पवृक्ष
समुद्र मंथन के दौरान जो 14 रत्न निकले, उनमें से एक था कल्पवृक्ष।
इस वृक्ष को देवताओं 🔱 के लोक स्वर्ग में स्थापित किया गया।
कल्पवृक्ष की अवधारणा जैन धर्म और बौद्ध धर्म में भी पाई जाती है।
स्कंद पुराण और भागवत पुराण में वर्णन मिलता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठने से —
"मन की शंकाएँ दूर होती हैं " "Doubts in the mind are dispelled"
"विचार निर्मल होते हैं " "Thoughts become pure"
"इच्छाएँ सहज रूप से पूर्ण होती हैं " "Wishes are fulfilled effortlessly"
कल्पवृक्ष को “देवताओं का इच्छा वृक्ष” ✨ "Wish Tree of the Gods." कहा गया है।
वास्तविक जीवन में कल्पवृक्ष
अध्यात्म में कहा गया है:
"जहाँ मन शांत हो और विचार साफ़ हों, वही कल्पवृक्ष है।"
"Where the mind is calm and thoughts are clear, that is the Kalpavriksha."
कई स्थानों पर विशिष्ट पेड़ों को कल्पवृक्ष 🌿 माना जाता है, जैसे
द्वारका / सोमनाथ बड़ (बरगद) वृक्ष को कल्पवृक्ष
राधा–कृष्ण की लीला स्थली (वृंदावन) कल्पवृक्ष दर्शन
दक्षिण भारत के मंदिर परिसर कल्पतरु
कल्पवृक्ष को कल्पतरु, कल्पद्रुम, कल्पलता और सुरतरु जैसे नामों से भी जाना जाता है।
कल्पवृक्ष का दार्शनिक अर्थ
कल्पवृक्ष का वास्तविक सार बहुत गहरा है:
कल्प = कल्पना / इच्छा
वृक्ष = वास्तविकता / साकार
यानी जो इच्छा को साकार कर दे — वही कल्पवृक्ष है।
कल्पवृक्ष यह सिखाता है कि
जिस मन में श्रद्धा और विश्वास है, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं।
"Nothing is impossible for a mind that has faith and belief."
कल्पवृक्ष और मनोकामना सिद्धि
जब हम किसी वृक्ष के नीचे शांत बैठते हैं, तो मन स्थिर होता है।
स्थिर मन में व्यक्ति अपनी सच्ची इच्छा पहचानता है और उसके लिए स्पष्ट दिशा मिलती है।
इसलिए कहा गया
"कल्पवृक्ष केवल इच्छाएँ पूरी नहीं करता, इच्छाएँ स्पष्ट करता है।"
"Kalpavriksha doesn't just fulfill wishes, it clarifies them."
ध्यान और कल्पवृक्ष साधना
कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर सरल ध्यान किया जा सकता है:
आँखें बंद करें , गहरी साँसें लें , अपनी मनोकामना स्पष्ट रूप से सोचें
वृक्ष को उस इच्छा को साकार करते हुए कल्पना करें
यह अभ्यास मन को शांत करता है, निर्णय क्षमता बढ़ाता है और सकारात्मक ऊर्जा देता है।
कल्पवृक्ष केवल 🔱 पौराणिक कथा नहीं, बल्कि जीवन का रूपक है।
जहाँ मन शांत हो और भावनाएँ शुद्ध — वही कल्पवृक्ष है।
🌿 कल्पवृक्ष हमें सिखाता है: ✨
"यदि इच्छा पवित्र है " "If the desire is pure"
"मन में विश्वास है " "There is faith in the mind"
और "प्रयास निरंतर है " And "The effort is continuous"
तो इच्छा अवश्य फलित होती है। The wish will surely come true.
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“Manikarnika – Where there is no death, but liberation”
भूमिका
वाराणसी—या काशी—के नाम मात्र से ही एक दिव्यता का अनुभव होता है। यह वह भूमि है जहाँ समय थम जाता है, और जीवन अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई देता है। काशी में गंगा नदी के किनारे स्थित मणिकर्णिका घाट को संसार का सबसे पवित्र श्मशान माना जाता है। यहाँ मृत्यु एक अंत नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार है।
मणिकर्णिका घाट का महत्व
मणिकर्णिका घाट काशी के सबसे प्राचीन एवं प्रमुख घाटों में से एक है। मान्यता है कि यहाँ शवदाह (अंत्येष्टि) निरंतर चलता है—24 घंटे, वर्ष के 365 दिन।
काशी एकमात्र स्थान है जहाँ मृत्यु का भय नहीं, बल्कि मुक्ति की आशा दिखाई देती है।
हिंदू मान्यता के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर होता है, तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है—यानी जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति।
शिव और देवी पार्वती की कथा
किवदंती के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव के साथ स्नान करते समय अपनी मणि (कर्ण की बाली) यहाँ खो दी। तभी से इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा।
एक अन्य मान्यता के अनुसार—
जब भगवान विष्णु ने इस स्थान पर तप किया, तो भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए उन्होंने भूमि एवं ब्रह्मांड का विशाल चक्र बनाया। उसी चक्र की एक शिला आज भी घाट पर विद्यमान है।
यह स्थान अपने भीतर हजारों वर्षों की आध्यात्मिक ऊर्जा समेटे हुए है।
मणिकर्णिका घाट की विशेषताएँ
अद्भुत निरंतरतायहाँ चिता की आग कभी नहीं बुझती — अग्नि एक निरंतर यज्ञ है।
मोक्ष का द्वारमाना जाता है कि यहाँ अंतिम संस्कार होने पर आत्मा मुक्त हो जाती है।
शव साधु व डोम राजा'डोम राजा' यहाँ अग्नि की परंपरा के संरक्षक हैं।
शांति + अराजकता का संगम
जलती चिताएँ,
गंगा का प्रवाह, शिव मंत्र — एक अनोखा अनुभव।
मणिकर्णिका – जीवन और मृत्यु का दर्शन
यहाँ खड़ा होकर यह समझ में आता है—
जीवन क्षणभंगुर है Life is fleeting
अहंकार व्यर्थ है Ego is futile
अंत में सब कुछ गंगा में विलीन हो जाता है In the end, everything dissolves in the Ganges.
काशी सिखाती है— मृत्यु अंत नहीं, एक नई शुरुआत है।
"Death is not the end, but a new beginning."
मणिकर्णिका घाट का अनुभव
यहाँ आने वाला हर व्यक्ति बदल जाता है।
जहाँ एक ओर जीवन का अंतिम अध्याय लिखा जा रहा होता है, वहीं दूसरी ओर घाट के ऊपर गलियों में जीवन हँसता-मुस्कुराता दिखाई देता है।
लोग कहते हैं—
“काशी में मौत मरती है।” "Death dies in Kashi."
गंगा किनारे नाव से घाट का दृश्य अद्भुत लगता है।
शाम के समय निकटवर्ती घाटों पर गंगा आरती देखें।
मणिकर्णिका घाट केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक विचार है—
"जीवन अनिश्चित है, और मृत्यु निश्चित।"
"Life is uncertain, and death is certain."
काशी कहती है—
“जब तक मैं हूँ, मृत्यु भी तुम्हें कुछ नहीं कर सकती।”
“As long as I am here, even death cannot harm you.”
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समुद्र मंथन हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक प्रसंगों में से एक है, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण और महाभारत आदि ग्रंथों में मिलता है। यह प्रसंग देवताओं (सुरों) और दानवों (असुरों) के बीच हुए सहयोग, संघर्ष और दिव्य वरदानों की प्राप्ति की कथा है।
कथा संक्षेप में
इंद्र के अभिमान के कारण देवताओं को राजा बलि से हार का सामना करना पड़ा और उनकी शक्तियाँ कमज़ोर हो गईं। तब भगवान विष्णु ने देवताओं को सलाह दी कि—
“असुरों के साथ मिलकर क्षीर सागर का मंथन करो। उसमें छुपे अमृत को प्राप्त करो।”
देवताओं ने असुरों के साथ समझौता किया कि अमृत मिलने पर सबको समान भाग मिलेगा।
समुद्र मंथन की प्रक्रिया
मंथन-दंड (रस्सी)राजा सर्प वासुकी
मंथन का धुरी (आधार)पर्वत मंदराचल
आधार (कूर्म अवतार)भगवान विष्णु ने कच्छप (कूर्म) रूप धारण कर पहाड़ को अपनी पीठ पर स्थिर किया
देवताओं और असुरों ने मिलकर मंथन किया
मंथन से निकले 14 रत्न (Ratnas)
समुद्र मंथन में कुल 14 मुख्य रत्न निकले —
विष (हलाहल) — शिव ने पीकर नीलकंठ नाम पाया
कामधेनु — दिव्य गाय
उच्चैःश्रवा — सफेद घोड़ा
ऐरावत — इंद्र का हाथी
कौस्तुभ मणि — विष्णु के कंठ पर सुशोभित
कल्पवृक्ष — इच्छा पूर्ण करने वाला वृक्ष
अप्सराएँ
वरुण का धन
लक्ष्मी जी — भगवान विष्णु के साथ विवाह
शंख
धन्वंतरि — अमृत कलश लेकर प्रकट हुए
अमृत — अमरत्व देने वाला
(सूची विभिन्न पुराणों में थोड़ी अलग हो सकती है)
अमृत लेकर धन्वंतरि जब प्रकट हुए तो देवताओं और असुरों में संग्रामशुरू हो गया। तभी भगवान विष्णु मोहिनी रूप में आए और अपनी मोहिनी माया से अमृत देवताओं को पिलाया।
इस प्रकार देवताओं को फिर से शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त हुआ तथा असुर पराजित हुए।
समुद्र मंथन का संदेश
बड़े लक्ष्य के लिए सहयोग आवश्यक है, चाहे वह विरोधी के साथ ही क्यों न हो।
सफलता पाने के लिए श्रम और धैर्य जरूरी है।
पहले विष (कठिनाइयाँ) आता है, फिर अमृत (फल) मिलता है।
“समुद्र मंथन केवल पुराणिक कथा नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है —
विपरीत परिस्थितियाँ ही हमारे भीतर छुपे ‘रत्न’ बाहर लाती हैं।”
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