21 मार्च 2024

Kushal Konwar | कुशल कोंवर | Revolutionary | क्रांतिकारी

 



फाँसी से पहले जेल में बचे उनके शेष समय के दौरान उन्होंने अपना समय गीता पढ़ कर बिताया। कुशल ने लगभग 112 दिन जेल में बिताए। 🇮🇳

🇮🇳 कुशल कोंवर जो ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ भारत छोड़ो आन्दोलन का हिस्सा रहे। उसी दौरान आन्दोलन ने कुछ क्षेत्रों में हिंसक रूप ले लिया। कुशल कोंवर को एक ऐसे गुनाह के लिए गिरफ्तार किया जो उन्होंने किया भी नहीं था। इस गुनाह के लिए उन्हें फाँसी की सजी दी गई। बिना किसी गलती और गुनाह के बाद भी उन्होंने फाँसी की इस सजा को स्वीकार किया। 

🇮🇳 कुशल कोंवर का जन्म 21 मार्च 1905 में हुआ था। कुशल का जन्म #असम के #गोलाघाट जिले में हुआ था। वह एक शाही परिवार से थे। #अहोम_साम्राज्य के शाही परिवार से होने पर उन्होंने कोंवर सरनेम का प्रयोग किया था। जिसे बाद में उन्होंने छोड़ भी दिया था। कुशल एक ऐसे व्यक्ति थे, जो शांत थे और सच्चाई से प्यार करने वाले थे। ये गुण उन्हें उनके माता-पिता #कनकेश्वरी_कोंवर और #सोनाराम_कोंवर से मिले थे।

🇮🇳 कुशल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा #बेजबरुआ स्कूल से हासिल की। अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद कुशल ने 1918 में गोलाघाट के गवर्नमेंट हाई स्कूल में आगे की शिक्षा प्राप्त की। 1921 के समय की बात है उस दौरान वह स्कूल में थे। गॉंधी जी का #असहयोग_आन्दोलन चल रहा था और उनके इस आन्दोलन से कुशल बहुत प्रभावित हुए जिसके बाद से उन्होंने इस आन्दोलन में सक्रिय रूप से भूमिका निभाई।

🇮🇳 1919 में जब ब्रिटिश सरकार ने #जलियांवाला_बाग हत्याकांड और रॉलेट एक्ट जारी किया उस दौरान कुशल केवल 17 वर्ष के थे। इस एक्ट का असल जलियांवाला बाग तक ही सीमित नहीं था। इसका असर पूरे भारत में देखने को मिला था। इस हत्याकांड के विरोध में असहयोग आन्दोलन की शुरूआत हुई और इस आन्दोलन का प्रभाव असम तक पहुँचा और कुशल और अन्य युवा सेनानी इस आन्दोलन में सक्रिय रूप से उतरे।

🇮🇳 कुशल का जीवन गाँधी जी के विचारों से अधिक प्रभावित था। गॉंधी जी के स्वराज, सत्य और अहिंसा से वाले आदर्शों से वह इस कदर प्रभावित हुए की उन्होंने #बेंगमई में एक प्राथमिक विद्यालय की स्थापना की और वहाँ एक शिक्षक के रूप में कार्य किया। इसके बाद वह एक क्लर्क के रूप में बालीजन टी एस्टेट में शामिल हुए, जहाँ उन्होंने कुछ समय के लिए काम किया। इस प्रकार गॉंधी जी के स्वतंत्रता के आह्वान और दिल में स्वतंत्र भारत को देखने की उनकी इच्छा में उन्होंने अपना जीवन देश के नाम समर्पित कर दिया। उन्होंने सत्याग्रह और अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन में #सरूपथर क्षेत्र के लोगों का नेतृत्व किया और कांग्रेस पार्टी को संगठित किया। इसके बाद वे सरुपथर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गए।

🇮🇳 10 अक्टूबर 1942 में स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं ने सरूपथर की रेलवे की पटरी से स्लीपरों हटा दिए थे जिसकी वजह से वहाँ से गुजरने वाली सैन्य रेल गाड़ी पटरी से उतर गई। जिसमें हजारों की तादाद में अंग्रेजी सैनिक मारे गए। पुलिस ने इलाके को तुरंत घेर लिया और इस घटना को अंजाम देने वालों को ढूँढना शुरू किया।

🇮🇳 इस घटना के लिए कुशल को आरोपी माना गया था। जबकि इस घटना में उनका कोई हाथ नहीं था। पुलिस कर्मियों के पास उनके गुनहगार होने का कोई सबूत नहीं था लेकिन फिर भी कुशल को रेलवे की तोड़फोड़ का मुख्य आरोपी माना गया और उनको इसके लिए गिरफ्तार किया गया।

🇮🇳 5 नवंबर 1942 में उन्हें गोलाघाट लाया गया और वहाँ की #जोरहाट जेल में बंद कर दिया गया। सीएम हम्फ्री की अदालत में उन्हें दोषी करार किया गया और उन्हें फाँसी की सजा दी गई। जबकि उन्होंने ये गुनाह किया भी नहीं था। लेकिन फिर भी कुशल ने गरिमा के साथ इस फैसले को स्वीकार किया।

🇮🇳 जेल में जब उनकी पत्नी #प्रभावती उनसे मिलने गई तो उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि उन्हें गर्व है कि भगवान ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान के लिए हजारों लोगों में से उन्हें चुना।

🇮🇳 फाँसी से पहले जेल में बचे उनके शेष समय के दौरान उन्होंने अपना समय गीता पढ़ कर बिताया। कुशल ने लगभग 112 दिन जेल में बिताए। 6 जून 1943 में उन्हे फाँसी की सजा सुनाई गई। और फाँसी देने की तिथि 15 जून 1943 की थी। 15 जून 1943 को शाम 4:30 बजे कुशल कोंवर को फाँसी दी गई।

साभार: careerindia.com


🇮🇳 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी क्रांतिकारी #कुशल_कोंवर  #kushal_konwar जी को उनकी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि !

🇮🇳💐🙏

वन्दे मातरम् 🇮🇳

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल

 साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

सूचना:  यंहा दी गई  जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की  कोई गारंटी नहीं है। सूचना के  लिए विभिन्न माध्यमों से संकलित करके लेखक के निजी विचारो  के साथ यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह  की जिम्मेदारी स्वयं निर्णय लेने वाले पाठक की ही होगी।' हम या हमारे सहयोगी  किसी भी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं है | धन्यवाद। ... 

Notice: There is no guarantee of authenticity or reliability of the information/content/calculations given here. This information has been compiled from various mediums for information and has been sent to you along with the personal views of the author. Our aim is only to provide information, readers should take it as information only. Apart from this, the responsibility of any kind will be of the reader himself who takes the decision. We or our associates are not responsible for this in any way. Thank you. 

World puppet day | विश्व कठपुतली दिवस

 



#विश्व_कठपुतली_दिवस

#world_puppet_day

भारत में पारंपरिक पुतली नाटकों की कथावस्तु में पौराणिक साहित्य, लोककथाएँ और किवदंतियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। पहले अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज, हीर-रांझा, लैला-मजनूं और शीरीं-फ़रहाद की कथाएँ ही कठपुतली खेल में दिखाई जाती थीं।

🇮🇳 विश्व कठपुतली दिवस प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। 'कठपुतली' का खेल अत्यंत प्राचीन नाटकीय खेल है, जो समस्त सभ्य संसार में प्रशांत महासागर के पश्चिमी तट से पूर्वी तट तक-व्यापक रूप प्रचलित रहा है। यह खेल गुड़ियों अथवा पुतलियों (पुत्तलिकाओं) द्वारा खेला जाता है। गुड़ियों के नर मादा रूपों द्वारा जीवन के अनेक प्रसंगों की, विभिन्न विधियों से, इसमें अभिव्यक्ति की जाती है और जीवन को नाटकीय विधि से मंच पर प्रस्तुत किया जाता है। कठपुतलियाँ या तो लकड़ी की होती हैं या पेरिस-प्लास्टर की या काग़ज़ की लुग्दी की। उसके शरीर के भाग इस प्रकार जोड़े जाते हैं कि उनसे बँधी डोर खींचने पर वे अलग-अलग हिल सकें।

साभार: bharatdiscovery.org

 साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

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20 मार्च 2024

Rohit Mehta | रोहित मेहता

 



रोहित मेहता (जन्म- 3 अगस्त, 1908, सूरत; मृत्यु- 20 मार्च, 1995, वाराणसी) प्रसिद्ध साहित्यकार, विचारक, लेखक‍, दार्शनिक, भाष्यकार और स्वतंत्रता सेनानी थे। वे निरंतर प्रयत्नशील जीवन में आस्था रखने वाले इंसान थे। कई बार जेल भी गये। उन्होंने यूरोप, एशिया, अफ्रीका, अमेरिका आदि देशों का भ्रमण किया और दर्शन पर प्रभावशाली व्याख्यान दिए।

🇮🇳 प्रसिद्ध विचारक, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी रोहित मेहता का जन्म 3 अगस्त, 1908 ईस्वी को #सूरत (#गुजरात) में हुआ था। सूरत, #अहमदाबाद और #मुंबई में उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की। विद्यार्थी जीवन से ही वे सार्वजनिक कार्यों में भाग लेने लगे थे। 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने गुजरात कॉलेज, अहमदाबाद की 3 महीने तक चली हड़ताल का नेतृत्व किया था। स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण उन्होंने 5 बार जेल की सजा काटी। वे कांग्रेस में समाजवादी विचारों के समर्थक थे। 

🇮🇳 रोहित मेहता योग्य व्यक्ति थे। उनमें क्षमताएं थीं, वे विचारक थे, दार्शनिक थे, भाष्यकार थे, लेखक थे और विख्यात वक्ता थे। उन्होंने यूरोप, एशिया, अफ्रीका, अमेरिका आदि देशों का भ्रमण किया और दर्शन पर प्रभावशाली व्याख्यान दिये। मेहता का मानना था कि वास्तविक रहस्य कभी न समाप्त होने वाली यात्रा में ही है। वे 1941 में #अडयार, #तमिलनाडु गए। मेहता ने 3 वर्षों तक #थियोसोफिकल_सोसाइटी में अंतर्राष्ट्रीय सेक्रेटरी का काम किया और 15 वर्षों तक इस संस्था की भारतीय शाखा के महामंत्री रहे।

🇮🇳 रोहित मेहता बहुत ही प्रखर लेखक‍ थे। उन्होंने दर्शन पर 25 से अधिक पुस्तकें लिखीं।

🇮🇳 प्रसिद्ध विचारक लेखक और स्वतंत्रता सेनानी रोहित मेहता का 20 मार्च, 1995 को #वाराणसी में निधन हो गया।

साभार: bharatdiscovery.org

🇮🇳 प्रसिद्ध साहित्यकार, विचारक, लेखक‍, दार्शनिक, भाष्यकार और स्वतंत्रता सेनानी #रोहित_मेहता  #Rohit_Mehta जी को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि ! 

🇮🇳💐🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व 

#आजादी_का_अमृतकाल

 साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

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S. Satyamurthy | एस. सत्यमूर्ति

 


एस. सत्यमूर्ति ( जन्म: 19 अगस्त, 1887, ज़िला तिरुचिराप्पल्ली, तमिलनाडु; मृत्यु: 20 मार्च, 1943) भारत के #क्रांतिकारी नेता थे, जिन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलन और भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया तथा जेल की सजाएं भोगीं।

🇮🇳 एस. सत्यमूर्ति का जन्म #तमिलनाडु के #तिरुचिराप्पल्ली ज़िले में, 19 अगस्त, 1887 में हुआ था। ये एक मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार से थे। इन्होंने गाँव में ही अपनी प्रारंभिक शिक्षा तथा मद्रास से उच्च शिक्षा प्राप्त की। इन्होंने विधि में अध्ययन किया तथा मद्रास से अपनी वकालत शुरू कर दी।

🇮🇳 एस. सत्यमूर्ति सन 1919 में कांग्रेस में सक्रिय रूप से शामिल हुए और सन 1923 में स्वराज पार्टी के उम्मीदवार के रूप में मद्रास विधानसभा में चुने गये। सत्यमूर्ति ने 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भाग लिया, जिस कारण इन्हें सन 1931 और 1932 में जेल की सजा हुई। दिल्ली में इन्हें भारतीय विधान परिषद के लिए चुना गया तथा बाद में कांग्रेस पार्टी के उपनेता चुने गये। सन 1940 में इन्होंने व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया, जिसमें इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन में भी हिस्सा लिया, जिसमें इन्हें जेल की सजा हुई।

🇮🇳 एस. सत्यमूर्ति का निधन 20 मार्च, 1943 में हो गया। यह एक महान वक्ता, शिक्षाविद और कला के पारखी थे, जो बाद में बहुत से राजनीतिज्ञों के पितामह भी रहे।

साभार: shiksha bharti network.com

🇮🇳 #भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के #क्रांतिकारी, महान वक्ता, शिक्षाविद और कला के पारखी #एस_सत्यमूर्ति जी को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि !

🇮🇳💐🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल

 साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

सूचना:  यंहा दी गई  जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की  कोई गारंटी नहीं है। सूचना के  लिए विभिन्न माध्यमों से संकलित करके लेखक के निजी विचारो  के साथ यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह  की जिम्मेदारी स्वयं निर्णय लेने वाले पाठक की ही होगी।' हम या हमारे सहयोगी  किसी भी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं है | धन्यवाद। ... 

Notice: There is no guarantee of authenticity or reliability of the information/content/calculations given here. This information has been compiled from various mediums for information and has been sent to you along with the personal views of the author. Our aim is only to provide information, readers should take it as information only. Apart from this, the responsibility of any kind will be of the reader himself who takes the decision. We or our associates are not responsible for this in any way. Thank you. 

Jaipal Singh Munda | जयपाल सिंह मुंडा

 



हर साल 20 मार्च को झारखंड के महान नेता, शिक्षाविद और हॉकी के अभूतपूर्व खिलाड़ी रहे 'मरांग गोमके' जयपाल सिंह मुंडा को उनकी परिनिर्वाण दिवस के मौके पर याद किया जाता है। मरांग गोमके एक उपाधि है, आदिवासी परंपरा में इसे सबसे बड़ा नेता कहा जाता है। यह उनकी प्रासंगिकता आज भी आदिवासी जीवन में जल, जंगल, जमीन के संघर्ष ‘आबुआ दिसुम आबुआ राज’ से जुड़ा है।

🇮🇳 जयपाल सिंह मुंडा का जन्म #झारखंड (सन् 2000 के पूर्व बिहार) की राजधानी #रांची से करीब 18 किलोमीटर दक्षिण, #खूंटी जिले के #टकरा_पाहनटोली में हुआ था। खूंटी से मात्र पाँच मील अर्थात आठ किलोमीटर दूरी पर अवस्थित टकरा पाहनटोली (सरना धर्म के पुजारियों का टोला) है, जो अब लगभग ईसाई गाँव में तब्दील हो गया है। यहाँ एक चर्च और प्राइमरी स्कूल है। जयपाल सिंह मुंडा का प्रारम्भिक नाम #प्रमोद_पाहन था। जयपाल सिंह ने अपनी जीवनी में लिखा है– “मेरा नाम किसने और कब बदला, मुझे नहीं मालूम। वह 1911 की 3 जनवरी थी, जिस दिन मेरा नाम बदल गया होगा। तब मैं 8-10 साल का रहा होउँगा। घर के लोग मुझे प्रमोद कहते थे और 3 जनवरी के पहले तक यही नाम था। लेकिन, 3 जनवरी, 1911 को जब मैं अपने बाबा (पिता) #अमरू_पाहन की उंगली थामे, सकुचाते हुए रांची के संत पॉल स्कूल पहुँचा तो न सिर्फ मेरी पैदाइश की तारीख बदल गयी, बल्कि मेरा नाम ही बदल गया।”

🇮🇳 संत पॉल स्कूल नाम लिखाने से पहले ही टकरा के प्राइमरी स्कूल के शिक्षक लूकस सर से हिंदी और गणित की शिक्षा प्राप्त कर चुके थे। संत पॉल स्कूल के तत्कालीन प्रधानाध्यपक कैनन कॉसग्रोव थे। उन्होंने अपनी पारखी नजरों से जयपाल सिंह की प्रतिभा को परख लिया था। छात्र जयपाल पढ़ाई में जितने तेज थे, उतने ही खेलकूद और अन्य गतिविधियों में अग्रणी थे। कॉसग्रोव उनकी इस बहुमुखी प्रतिभा से प्रभावित थे, बल्कि उन्हें अपना सर्वप्रिय छात्र बना लिया था। जयपाल सिंह को संत पॉल में पढ़ते हुए छह साल हो गए थे कि 1918 में कॉसग्रोव सेवानिवृत होकर इंग्लैंड चले गए।

🇮🇳 कॉसग्रोव लौटते वक्त अपने साथ छात्र जयपाल सिंह को भी इंग्लैंड ले जा रहे थे। “जब चारों ओर खबर फैल गई कि कॉसग्रोव भारत छोड़कर इंग्लैंड अपने देश वापस जा रहे हैं… लेकिन, जिस बात की चर्चा ज्यादा थी और जिस बात से लोग हैरत में थे, वह यह थी कि कॉसग्रोव अपने संग मुझे ले जा रहे थे।”

🇮🇳 रांची में रहते हुए जयपाल सिंह को सबसे ज्यादा अपनी माँ की याद आती थी। वह अक्सर अपनी माँ को यादकर भावुक हो जाते थे। माँ को याद करते हुए वे लिखते हैं– “मैं माँ का बहुत प्यारा था।… माँ एक साधारण आदिवासी औरत थी। ममत्व और दयालुता से भरी-पूरी बहुत ही सुंदर, पर एक रूढ़िवादी स्त्री थी। दस-पन्द्रह दिनों के भीतर वह एक बार जरूर रांची आती थी, मुझसे मिलने। आने पर मुर्गा बनाती। वह कॉसग्रोव को बहुत पसंद नहीं करती थी। इस बात से हमेशा सशंकित रहती थी कि कॉसग्रोव मुझे ईसाई बना देगा। शायद इसलिए कॉसग्रोव भी दूरी बरतते थे। लेकिन, मैं माँ की इच्छा का सम्मान नहीं रख सका। मेरी नजदीकियां कॉसग्रोव के साथ लगातार बढ़ती गईं और उसने मुझे ईसाई बना ही दिया।”

🇮🇳 #तारा_बनर्जी राजनीतिक रूप से अत्यंत प्रतिष्ठित बंगाली परिवार की बेटी थीं। तारा के नाना #ओमेश_चंद्र_बनर्जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सह-संस्थापक और पहले अध्यक्ष थे। माँ #एग्नेस_मजूमदार और पिता #जी_के_मजूमदार की बंगाली समाज में काफी प्रतिष्ठा थी। जयपाल सिंह ने तारा को शादी के लिए प्रस्ताव दिया और तारा तथा उसके परिवार से सहमति मिलते ही #दार्जिलिंग में दोनों का विवाह 1932 में ईसाई रीति से हो गया।

🇮🇳 जयपाल सिंह कुछ दिनों तक पारिवारिक जीवन का आनंद ले ही रहे थे कि ऑयल कंपनी ने उनकी नौकरी के कॉन्ट्रैक्ट का नवीनीकरण करने से मना कर दिया। आजीविका की तलाश में उन्हें अफ्रीका जाकर एक कॉलेज में शिक्षक की नौकरी करनी पड़ी। तारा कुछ दिन साथ रहकर दार्जिलिंग वापस लौट आईं। इसी बीच जयपाल सिंह एक अफ्रीकी महिला ग्रेस के मोहपाश में पड़ गए। यह बात 1934-36 की है।

सन् 1937 में वे रायपुर के राजकुमार कॉलेज में रहे। लेकिन, कॉलेज के प्रिंसिपल स्मिथ पीयर्स से ठन जाने के कारण जयपाल सिंह को कॉलेज की नौकरी त्यागनी पड़ी। जल्द ही उन्हें बीकानेर राज्य में नौकरी मिल गई। लेकिन, ईमानदारी के कारण वहाँ भी नौकरी छोड़नी पड़ी और फिर वे #कश्मीर #राजा_हरि_सिंह के बेटे #कर्ण_सिंह को पढ़ाने के लिए चले गए। कश्मीर की आबोहवा तारा को रास नहीं आई और वह बीमार हो गईं। अतः जयपाल सिंह को कश्मीर छोड़ना पड़ा।

🇮🇳 अफसोस है कि जयपाल सिंह मुंडा का मूल्यांकन निर्मम रूप से एकपक्षीय है। उनका सही मूल्यांकन समग्रता में होना चाहिए। एक महान आदिवासी नेता, झारखंड आंदोलन को बेहतर नेतृत्व देने वाला नेता और एक महान खिलाड़ी जिसके नेतृत्व में गुलाम भारत ने पहली दफा गोल्ड मेडल जीता। आईसीएस जैसी नौकरी को त्यागकर आंदोलन के लिए सब कुछ न्यौछावर कर देने वाला व्यक्ति और एक सरल, सहज आदिवासी, जो कांग्रेसियों के छल-कपट को समझ नहीं पाया। जैसे कि छल से एकलव्य से अँगूठा माँग लिया गया था।

🇮🇳 बहरहाल, आदिवासियों के लिए उनका संघर्ष संविधान सभा में उनके भाषण में साफ झलकता है। यही उन्हें मारंग गोमके यानी सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित करता है। इसके बावजूद वर्ष 2000 में झारखंड के अलग बनने के बाद उन्हें जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया है।

प्रस्तुति: देवेंद्र शरण

(संपादन : समीक्षा सहनी/नवल/अनिल)

संदर्भ : मरङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा, अश्विनी कुमार पंकज, प्रभात प्रकाशन, 2020 

साभार: forwardpress.in

#Dr_Jaipal_Singh_Munda

#death anniversary

🇮🇳 1928 में एम्सटर्डम (नेदरलैंड्स) में हुए #ओलिंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय #हॉकी टीम के कप्तान, संविधान बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले महान आदिवासी नेता, शिक्षाविद 'मरांग गोमके' #डॉ_जयपाल_सिंह_मुंडा जी को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि !

🇮🇳💐🙏

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Nisha millet | निशा मिलेट | Swimmer

 



निशा मिलेट (जन्म- 20 मार्च, 1982) भारत की जानी-मानी महिला #तैराक #swimmer हैं। वह भारत के लिए 2000 सिडनी ओलंपिक तैराकी टीम में अर्जुन पुरस्कार जीतने वाली एकमात्र महिला थीं। राष्ट्रीय खेलों की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के लिए प्रधानमंत्री का पुरस्कार उन्होंने 1997 और 1999 में प्राप्त किया।

🇮🇳 निशा मिलेट को पाँच साल की उम्र में डूबने का अनुभव था, जिसके बाद उनके पिता ने उन्हें अपने डर से उबरने के लिए तैराकी सीखने के लिए मनाया।

🇮🇳 1991 में निशा ने अपने पिता के मार्गदर्शन में, ऑबरे शेनयायनगर क्लब, चेन्नई से तैरने का तरीका सीखा और 1992 में चेन्नई में 50 मीटर फ्री स्टाइल में अपना पहला राज्य स्तर का पदक जीता।

🇮🇳 1994 में निशा मिलेट ने हांगकांग के एशियाई आयु समूह चैंपियनशिप में अपना पहला अंतरराष्ट्रीय पदक जीता। यह उनके शासन काल की शुरुआत थी।

🇮🇳 वह 1999 में राष्ट्रीय खेलों में 14 स्वर्ण पदक जीतने वाली एकमात्र भारतीय एथलीट थीं।

🇮🇳 निशा मिलेट ने अपने कॅरियर की ऊँचाई पर 200 सी फ्री स्टाइल में 2000 सिडनी ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था, जहाँ उन्होंने शुरुआत में अच्छा किया; परन्तु सेमी फाइनल तक ना पहुँच पाई।

🇮🇳 निशा ने 100 मीटर फ्री स्टाइल में एक मिनट के बाधा को तोड़ने वाला पहला भारतीय तैराक होने का गौरव भी हासिल किया था।

🇮🇳 उन्होंने बहुत-से सम्मान भी हासिल किए-

★ 2003 में एफ्रो-एशियन गेम्स, महिला बैकस्ट्रोक रजत पदक भी प्राप्त किया।

★ 2002 में कर्नाटक राज्य एकलव्य पुरस्कार प्राप्त किया।

★ 1999 में मणिपुर राष्ट्रीय खेलों में खेल में सर्वोच्च स्वर्ण पदक प्राप्त किया।

★ राष्ट्रीय खेलों की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के लिए प्रधानमंत्री का पुरस्कार 1997 और 1999 में प्राप्त किया।

साभार: bharatdiscovery.org

🇮🇳 #अर्जुन_पुरस्कार जीतने वाली एकमात्र महिला; भारत की जानी-मानी तैराक #निशा_मिलेट जी को जन्मदिन की ढेरों बधाई एवं अनंत शुभकामनाऍं !

🇮🇳🌹🙏

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

 साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

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Brave Queen Avanti Bai | वीरांगना रानी अवंती बाई

 



.लेकिन वो कुछ करते इसके पहले ही वीरांगना रानी अवंती बाई ने अपने अंगरक्षक की तलवार छीनकर स्वयं की जीवन लीला समाप्त कर ली. 🇮🇳

🇮🇳 `देश, धर्म के लिए लड़ो या चूड़ियाँ पहन लो`, जानिए वीरांगना रानी अवंती बाई की शौर्य गाथा 🇮🇳

🇮🇳 आज एक ऐसी वीरांगना रानी अवंती बाई का बलिदान दिवस है, जिनके जीवन के कमसुने पहलुओं से आपको रुबरु करा रहे हैं.

🇮🇳 देश की स्वाधीनता के मार्ग को कई वीर-वीरांगनाओं ने अपने रक्त की अंतिम बूँद तक समर्पित करके सींचा है. लेकिन इन बलिदानों में वो नाम चुनिंदा ही रहे है जिनके साथ इतिहासकारों ने न्याय किया और उन्हें यथोचित सम्मान दिया है. इसके बावजूद इतिहास के पन्नों में कई नाम ऐसे दिखाई पड़ते है, जिन्हें लेकर जनमानस में दूर-दूर तक कोई जानकारी नहीं है, उन्हें लेकर सम्मान तो दूर कोई उनके नाम और कार्यों से भी परिचित नहीं है. भारत के स्वर्णिम इतिहास को इस दरिद्रता से उभारकर इन गुमनाम वीर क्रांतिकारियों को उनके संघर्षों और सर्वोच्च बलिदान के सर्वोच्च सम्मान दिलाना हम सबकी जिम्मेदारी है.

🇮🇳 आज एक ऐसी वीरांगना रानी अवंती बाई का बलिदान दिवस है, जिनके जीवन के कमसुने पहलुओं से आपको रुबरु करा रहे हैं. यह बात उन दिनों की है जब देश के कुछ क्षेत्रों में क्रांति का शुभारम्भ हो चुका था और पूरे #महाकौशल क्षेत्र में #स्वाधीनता को लेकर क्रांतिकारियों की हलचलें बढ़ गईं थी.

🇮🇳 इस बीच #मध्यप्रदेश के #रेवांचल क्षेत्र में रामगढ़ की रानी अवंती बाई, #गढ़_पुरवा के #राजा_शंकरशाह और #राजकुमार_रघुनाथ_शाह के नेतृत्व में क्रांति को लेकर कई गुप्त सभाएं आयोजित की जा रही थी, जिसकी रणनीतिक रुप से सारी जिम्मेदारी रानी अवंती बाई पर थी. इन गुप्त सभाओं में एक पत्र के साथ चूड़ियों को अलग-अलग रियासतों के राजाओं जागीरदारों तक भेजा जाता था. पत्र पर संदेश होता था कि -  "अंग्रेजों से संघर्ष के लिए तैयार रहो या चूड़ियाँ पहनकर घर में बैठो." आत्म स्वाभिमान को झकझोर देने वाले इस प्रयास में पत्र जहाँ एकता के लिए प्रेरित करता प्रतीत होता तो वहीं चूड़ियाँ पुरुषार्थ जागृत करने का सशक्त माध्यम बनी. नतीजन पूरे रेवांचल में सन् 1857 की क्रांति की ज्वाला धधक उठी .

🇮🇳 रानी अवंती बाई की जीवन यात्रा के बारे में आपको बताएं तो मध्यप्रदेश  में 16 अगस्त 1831 को #मनकेहणी, जिला #सिवनी के जमींदार #राव_जुझार_सिंह के यहाँ इस वीर बालिका का जन्म हुआ, जुझार सिंह लोधी राजपूत समुदाय के शासक थे. रानी अवंती बाई ने अपने बचपन से ही तलवारबाजी, घुड़सवारी इत्यादि कलाएं सीख  ली थी. बाल्यकाल से ही वीर व साहसी इस वीरांगना की जैसे-जैसे आयु बढ़ती गई उनकी वीरता और शौर्य की चर्चाएं भी बढ़ने लगी. 

🇮🇳 इसी बीच पिता जुझार सिंह ने रानी अवंती बाई के विवाह का प्रस्ताव अपने सजातीय रामगढ़, मण्डला के राजपूत #राजा_लक्ष्मण_सिंह के पुत्र #राजकुमार_विक्रमादित्य_सिंह के लिए भेजा जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकारा. विवाह के बाद रानी अवंती बाई सिवनी छोड़ #रामगढ़, #मंडला की कुलवधु हो गई. लेकिन विवाह के कुछ वर्षों के भीतर ही सन् 1850 में राजा लक्ष्मण सिंह का स्वर्गवास हो गया.

जिसके बाद राजकुमार विक्रमादित्य सिंह ने राजकाज सँभाला. साथ में रानी अवंती बाई रामगढ़ के दुर्ग  में अपने दो पुत्रों #अमान_सिंह और #शेर_सिंह के साथ सुखी जीवन व्यापन कर रहे थे. लेकिन यकायक थोड़े समयावधि के बाद ही विक्रमादित्य सिंह का स्वास्थ्य भी क्षीण होने लगा और कुछ वर्षों के भीतर ही उनकी भी मौत हो गई. अब दोनों छोटे राजकुमारों के साथ प्रजा के संरक्षण की जिम्मेदारी रानी अवंती बाई के ऊपर आ गई.

🇮🇳 एक ओर रामगढ़ और रानी अवंती बाई इस समय एक ओर इन विषम परिस्थितियों से दो-दो हाथ कर रहे थे, तो वहीं पूरे देश में लार्ड डलहौजी हड़प नीति के जरिये तेजी से साम्राज्य विस्तार कर रहा था. उसकी कुदृष्टि अब रानी के रामगढ़ पर थी लेकिन रानी किसी भी कीमत पर अपनी स्वाधीनता का सौदा नहीं करना चाहती थी लेकिन अपनी हड़प नीति से कानपुर, झाँसी, नागपुर, सतारा समेत कई अन्य रियासतों को हड़प चुके डलहौजी ने अब रामगढ़ को अपना निशाना बनाया और पूरी रियासत को "कोर्ट ऑफ वार्ड्स" के अधीन कर लिया. अब रामगढ़ का राजपरिवार अंग्रेजी सरकार की पेंशन पर आश्रित हो गया था. लेकिन बेबस रानी महज अपमान का घूँट पीकर सही समय की प्रतीक्षा करने लगी और यह मौका हाथ आया 1857 की क्रांति में, जब पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का बिगुल फूँक चुका था.

🇮🇳 अंग्रेजों ने तब तक भारत के अनेक भागों में अपने पैर जमा लिए थे, जिनको उखाड़ने के लिए रानी अवंती बाई ने रेवांचल में क्रांति की शुरुआत की और बतौर भारत की पहली महिला क्रांतिकारी अंग्रेजों के विरुद्ध ऐतिहासिक निर्णायक युद्धों में भाग लिया. इस बीच रानी के सहयोगी राजा शंकरशाह और राजकुमार रघुनाथ शाह को दिए गए मृत्युदण्ड ने क्रांति की इस ज्वाला को ओर भड़का दिया. कई देशभक्त राजाओं और जागीरदारों का समर्थन रानी को मिल चुका था, लिहाजा उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत करके अपने राज्य से गोरे अधिकारियों को निकाल भगाया और राज्य की बागडोर फिर अपने हाथ में ले ली. 

🇮🇳 इसकी खबर जब बड़े गोरे अधिकारियों को लगी तो उनके पाँव तले जमीन खिसक गई. रानी ने एक-एक करके मंडला, #घुघरी, #रामनगर, #बिछिया समेत कई रियासतों से अंग्रेजों को निकाल भगाया. लगातार युद्धों के बाद थकी हुई सेना और सशस्त्रो व संसाधनों के अभाव के बीच अंग्रेजों ने फिर दुगनी ताकत से रानी पर हमला किया. रानी इस समय मंडला पर शासन कर रही थी जहाँ से उन्हें  बाहर निकलकर #देवहारगढ़ की पहाड़ियों में ढेरा डालना पड़ा.

🇮🇳 रानी के जीते दुर्गों में लूटपाट के बाद अंग्रेजी सेना ने रानी के पास आत्मसमर्पण का प्रस्ताव भेजा जिस पर माँ भारती की इस वीर बेटी की प्रतिक्रिया दी कि - "लड़ते-लड़ते बेशक मरना पड़े लेकिन अंग्रेजों के भार से दबूँगी नहीं" इसके बाद अंग्रेजी सेना ने पूरी पहाड़ी को घेर कर रानी की सेना पर हमला बोल दिया. कई दिनों तक चले इस युद्ध में कई राजा गोरी सरकार की शरण में चले गए और उनकी सेना का साथ देने लगे. #रीवा का नरेश तो पहले ही उनके साथ हो गया था.

🇮🇳 आखिरकार वो दिन आ गया जो इतिहास में रानी के शौर्य को अमर करने वाला था,  20 मार्च, 1858 का दिन था. युद्ध में कहने को रानी अवंती बाई की सेना मुट्ठी भर थी लेकिन इन वीरों ने अंग्रेजी सेना को पानी पिला दिया. इस शेरनी की सेना के कई जाबाज सैनिक घायल हो चुके थे, गोली लगने स्वयं यह भी बुरी तरह घायल हो चुकी थी. इस मौके का कायर अंग्रेजी सेना ने फायदा उठाना चाहा लेकिन वो कुछ करते इसके पहले ही वीरांगना रानी अवंती बाई ने अपने अंगरक्षक की तलवार छीनकर स्वयं की जीवन लीला समाप्त कर ली.

~ कुलदीप नागेश्वर पवार

साभार: zeenews.india.com

🇮🇳 युद्धभूमि में अपने रणकौशल से अंग्रेजी सेनाओं को कई बार परास्त करने के बाद, अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए 1858 में अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाली स्वाभिमानी, आत्मबलिदानी #वीरांगना #रानी_अवंती_बाई जी को उनके #बलिदान_दिवस पर विनम्र श्रद्धांजलि !

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जय मातृभूमि 🇮🇳

#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

#आजादी_का_अमृतकाल

 साभार: चन्द्र कांत  (Chandra Kant) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - मातृभूमि सेवा संस्था 

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